गायब होती गौरैया की चहचहाहट : संरक्षण के लिए लोगों को आगे आने की जरूरत, बदलती जीवनशैली और शहरीकरण से सिकुड़ रहा है गौरैया का बसेरा
छोटी पहल से बड़ा बदलाव संभव
कभी हर आंगन की रौनक रही गौरैया अब शहरों से गायब होती जा रही है। शहरीकरण, बंद मकान और पेस्टिसाइड ने उसके बसेरे और भोजन छीन लिए। गांव भी अब सुरक्षित नहीं रहे। विशेषज्ञों का मानना है कि कृत्रिम घोंसले और दाना-पानी की छोटी पहल से इस नन्ही चिड़िया को फिर लौटाया जा सकता है।
जयपुर। कभी हर घर-आंगन में चहचहाने वाली गौरैया अब शहरों में बहुत कम दिखाई देती है। सुबह की शुरुआत उसकी मीठी आवाज से होती थी, लेकिन अब यह आवाज धीरे-धीरे खामोश होती जा रही है। पहले लोग अपने घरों के आंगन, छत और रोशनदानों में इन पक्षियों के लिए दाना-पानी रखते थे। लेकिन अब आधुनिक और डिजाइनदार मकानों में रोशनदान की जगह बंद हो चुकी है, जिससे गौरैया के प्राकृतिक बसेरे खत्म होते जा रहे हैं।
शहरीकरण ने छीना आशियाना: तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने गौरैया के जीवन पर सीधा असर डाला है। कंक्रीट के जंगल में न तो उन्हें घोंसला बनाने की जगह मिल रही है और न ही पर्याप्त भोजन। जहां पहले मिट्टी और लकड़ी के घर होते थे, अब वहां पूरी तरह पक्के और बंद ढांचे बन गए हैं।
खेती में पेस्टिसाइड बना खतरा: विशेषज्ञों के अनुसार खेती में बढ़ते रासायनिक पेस्टिसाइड का उपयोग भी गौरैया के लिए घातक साबित हो रहा है। गौरैया मुख्य रूप से छोटे कीड़े-मकोड़ों और अनाज पर निर्भर रहती है। पेस्टिसाइड युक्त भोजन करने से उनकी प्रजनन क्षमता प्रभावित होती है और अंडों का बाहरी खोल कमजोर हो जाता है, जिससे नई पीढ़ी का जन्म प्रभावित होता है।
गांवों में भी कम हो रहा ठिकाना: पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि गौरैया ने शहरों से गांवों की ओर रुख जरूर किया, लेकिन वहां भी हालात अब पहले जैसे नहीं रहे। गांवों में कच्चे घरों की जगह पक्के मकानों ने ले ली हैए जिससे उनके ब्रीडिंग हैबिटाट पर असर पड़ा है।
छोटी पहल से बड़ा बदलाव संभव
रक्षा संस्थान से जुड़े रोहित गंगवाल बताते हैं कि यदि लोग चाहें तो गौरैया को बचाया जा सकता है। इसके लिए घरों में कृत्रिम घोंसले लगाना एक प्रभावी उपाय है। कई लोग जूतों के डिब्बों, प्लास्टिक की बोतलों, लकड़ी के बॉक्स और मटकियों में छेद करके घोंसले बना रहे हैं।
लोगों को निभानी होगी जिम्मेदारी
पक्षी प्रेमी जॉय गार्डनर का कहना है कि गौरैया केवल एक पक्षी नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरण संतुलन की महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि समय रहते इसके संरक्षण के लिए कदम नहीं उठाए गए, तो यह हमेशा के लिए हमारे जीवन से गायब हो सकती है।

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