नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व 11 अक्टूबर से शुरू : ग्रह-नक्षत्रों का बनेगा महासंयोग, हाथी पर सवार होकर आएंगी माता रानी
20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा
जयपुर। शारदीय नवरात्रि का नौ दिवसीय पर्व 11 अक्टूबर से शुरू होगा। इस बार नवरात्रि की शुरुआत रविवार को होने से माता रानी का आगमन हाथी पर माना जा रहा है। ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, देवी दुर्गा का हाथी पर आगमन अच्छी वर्षा, कृषि उत्पादन में वृद्धि और सुख-समृद्धि का संकेत माना जाता है। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को होगा, जबकि 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दशहरा मनाया जाएगा।पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान, जयपुर-जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ. अनीष व्यास ने बताया कि इस वर्ष शारदीय नवरात्रि में ग्रह-नक्षत्रों का विशेष संयोग बन रहा है। नवरात्रि के पहले दिन सूर्योदय के समय हस्त नक्षत्र और शुक्ल योग का प्रभाव रहेगा। इसके साथ ही गुरु और चंद्रमा के केंद्र संबंध से गजकेसरी योग बनेगा। शनि के मीन राशि में स्थित होने को भी ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस दौरान अमृत सिद्धि, सर्वार्थ सिद्धि और रवि योग भी बनेंगे। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन योगों में पूजा-पाठ, साधना और शुभ कार्य करना फलदायी माना जाता है।
सुख-समृद्धि का प्रतीक है हाथी पर आगमन : डॉ. व्यास ने बताया कि नवरात्रि में माता की सवारी का निर्धारण पर्व के आरंभ वाले दिन के आधार पर किया जाता है। रविवार को नवरात्रि शुरू होने के कारण माता का वाहन हाथी माना गया है। धार्मिक मान्यताओं में हाथी को ज्ञान, वैभव और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि माता का हाथी पर आगमन अच्छी वर्षा, खेती में उन्नति और अन्न-धन की वृद्धि का संकेत देता है। हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं।
अभिजीत मुहूर्त में करें घट स्थापना : नवरात्रि के पहले दिन घट स्थापना के साथ देवी दुर्गा की पूजा शुरू होगी। डॉ. व्यास के अनुसार, 11 अक्टूबर को अभिजीत मुहूर्त सुबह 11:49 से दोपहर 12:37 बजे तक रहेगा। वहीं, धनु लग्न सुबह 11:32 से दोपहर 1:36 बजे तक रहेगा। प्रतिपदा तिथि 10 अक्टूबर की रात 9:19 बजे शुरू होकर 11 अक्टूबर की रात 9:30 बजे समाप्त होगी। उदयातिथि के अनुसार नवरात्रि का आरंभ 11 अक्टूबर से होगा।
नौ दिनों तक होगी देवी के नौ स्वरूपों की पूजा : नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री, दूसरे दिन मां ब्रह्मचारिणी, तीसरे दिन मां चंद्रघंटा, चौथे दिन मां कूष्मांडा, पांचवें दिन मां स्कंदमाता, छठे दिन मां कात्यायनी, सातवें दिन मां कालरात्रि, आठवें दिन मां महागौरी और नौवें दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाएगी।
कलश स्थापना के लिए ये सामग्री जरूरी : घट स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा कलश, मौली, रोली, अक्षत, सुपारी, सिक्का, आम या अशोक के पांच पत्ते, नारियल, लाल कपड़ा, चुनरी, फल-फूल और पूजा सामग्री की आवश्यकता होगी। विधि-विधान से पूजा के लिए सबसे पहले पूजा स्थल की सफाई करें। इसके बाद मिट्टी के पात्र में जौ बोएं और जल से भरे कलश पर स्वस्तिक बनाकर मौली बांधें। कलश में गंगाजल, सुपारी, अक्षत और सिक्का डालकर उसके ऊपर पांच पत्ते लगाएं। लाल कपड़े में लिपटा नारियल कलश पर स्थापित करें। इसके बाद मां दुर्गा का आह्वान कर पूजा-अर्चना करें और व्रत का संकल्प लें।

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