अस्पतालों के बाहर रात में कान फोड शोर, दिन में 50.7 डेसिबल दर्ज और रात में 47.4 डेसिबल रहा स्तर
ध्वनि स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी
कोटा। अस्पताल का माहौल मरीजों के लिए सुकून और शांति देने वाला होना चाहिए, लेकिन शहर में अस्पतालों के आसपास बढ़ता यातायात और वाहनों का शोर इस माहौल को प्रभावित कर रहा है। अस्पताल परिसर के बाहर लगातार आने-जाने वाले वाहन, हॉर्न और अन्य गतिविधियों से ध्वनि प्रदूषण बढ़ रहा है। प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से सितंबर माह में जारी रिपोर्ट में शहर के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और एमबीएस अस्पताल के आसपास ध्वनि प्रदूषण तय मानक से अधिक रहा है। न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल दिन में ध्वनि स्तर 50.7 डेसिबल दर्ज किया गया, जो निर्धारित 50 डेसिबल की सीमा से 0.7 डेसिबल अधिक है। वहीं रात में ध्वनि स्तर 47.4 डेसिबल दर्ज हुआ, जो निर्धारित सीमा 40 डेसिबल से काफी अधिक है। वहीं एमबीएस अस्पताल के आसपास दिन में 52.1 डेसिबल और रात में 48.9 डेसिबल दर्ज किया गया।
दिन से ज्यादा रात में अधिक शोर
रिपोर्ट के अनुसार कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल के आसपास दिन के समय ध्वनि स्तर 50 डेसिबल की निर्धारित सीमा से थोड़ा अधिक रहा। हालांकि यह अंतर बहुत ज्यादा नहीं है, लेकिन अस्पताल जैसे संवेदनशील क्षेत्र में लगातार शोर मरीजों, उनके परिजनों और अस्पताल स्टाफ के लिए परेशानी का कारण बन सकता है। वहीं रात के समय अधिक शोर दर्ज किया गया है। अस्पताल के आसपास वाहनों की आवाजाही अधिक रहती है। मरीजों को लेकर आने वाली एंबुलेंस, निजी वाहन, आॅटो, टैक्सी और अन्य वाहनों की आवाजाही के साथ कई बार हॉर्न का इस्तेमाल भी शोर बढ़ाता है। अस्पताल के बाहर सड़क पर यातायात का दबाव बढ़ने से स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है।
प्रदेश के दूसरे अस्पतालों से कोटा बेहतर
रिपोर्ट में प्रदेश के प्रमुख शहरों के अस्पतालों के आसपास ध्वनि प्रदूषण के आंकड़े भी दिए गए हैं। इनमें उदयपुर के एमबी हॉस्पिटल के आसपास दिन में 78.4 डेसिबल और रात में 66.1 डेसिबल तक ध्वनि स्तर दर्ज किया गया। जयपुर के एसएमएस मेमोरियल अस्पताल के आसपास दिन में 65.9 डेसिबल, जबकि रात में 58.4 डेसिबल दर्ज हुआ। बीकानेर के पीबीएम अस्पताल के आसपास दिन में 65.4 और रात में 60.7 डेसिबल ध्वनि स्तर रहा। इसके मुकाबले कोटा के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और एमबीएस अस्पताल का स्तर अपेक्षाकृत कम है, लेकिन दिन में निर्धारित सीमा से ऊपर होना अस्पताल के आसपास ध्वनि नियंत्रण की जरूरत को जरूर सामने लाता है।
ध्वनि स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी
अस्पतालों के आसपास शोर को नियंत्रित करने के लिए साइलेंस जोन की व्यवस्था की जाती है। इसका उद्देश्य यह है कि मरीजों को इलाज के दौरान शांत वातावरण मिल सके। ऐसे क्षेत्रों में अनावश्यक हॉर्न, तेज आवाज में लाउडस्पीकर, वाहनों से होने वाले अनावश्यक शोर और अन्य ध्वनि स्रोतों पर नियंत्रण जरूरी होता है। कोटा में भी अस्पताल के आसपास यदि नियमित रूप से ध्वनि स्तर की निगरानी की जाए और यातायात व्यवस्था को व्यवस्थित किया जाए तो शोर को निर्धारित सीमा में रखने में मदद मिल सकती है। अस्पताल में भर्ती मरीजों के लिए आराम और नींद उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लगातार होने वाला यातायात का शोर विशेष रूप से गंभीर मरीजों, बुजुर्गों और बच्चों के लिए परेशानी बढ़ा सकता है।
फैक्ट फाइल
-क्षेत्र: न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल, कोटा
-दिन में ध्वनि स्तर: 50.7 डेसिबल
-निर्धारित सीमा: 50 डेसिबल
-दिन में अंतर: 0.7 डेसिबल अधिक
-रात में ध्वनि स्तर: 47.4 डेसिबल
-रात में स्थिति: 7.4 डेसिबल अधिक
एक्सपर्ट व्यू
-50 डेसिबल से ऊपर लगातार शोर से हार्ट के मरीजों का ब्लड प्रेशर बढ़ता है। आईसीयू के मरीजों की रिकवरी धीमी होती है। इसके अलावा नवजात बच्चों की नींद भी प्रभावित हो जाती है। अधिक शोर मरीजों के लिए साइलेंट स्ट्रेस है। तय मानक से अधिक ध्वनि प्रदूषण के कारण मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
-डॉ. संजय शायर, वरिष्ठ चिकित्साधिकारी
प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से सितंबर माह में जारी रिपोर्ट में प्रदेश के प्रमुख अस्पतालों सहित कोटा शहर के न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल और एमबीएस अस्पताल के आसपास ध्वनि प्रदूषण तय मानक से अधिक रहा है।
-विवेक गर्ग, एसएसओ, प्रदूषण नियंत्रण मंडल

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