पेपर छूट गया, घर कच्चा रह गया और और वह बेजुबानों के लिए ड्यूटी देता रह गया
जब गाय की जान बचाने के लिए छोड़ दिया 12वीं का बोर्ड पेपर
कोटा। कोटा को लोग कोचिंग सिटी के नाम से जानते हैं। यहां हर गली में डॉक्टर-इंजीनियर बनने का सपना देखा जाता है। इसी शहर की दोस्तपुरा की एक गली में एक ऐसा घर है जिसके ऊपर आज तक आरसीसी की छत भी नहीं है। केलुओं से ढका हुआ वो घर है 35 साल के दीपक महावर का। घर की आर्थिक हालत बचपन से ही कमजोर है और आज भी वैसी ही है। लेकिन इसी कच्चे घर में एक ऐसा लड़का रहता है जो पूरे कोटा को इंसानियत का मतलब सिखा रहा है। दीपक पिछले 10 साल से लावारिस जानवरों की सेवा कर रहा है। न कोई एनजीओ, न कोई चंदा, न कोई दिखावा। वह खुद को कुछ नहीं, बस एक ह्यस्वयंसेवकह्ण कहता है।
रात 11 बजे निकलने वाला वो लड़का
दीपक की सेवा की शुरुआत आज से 10 साल पहले हुई थी। तब वह स्कूल में पढ़ता था। लेकिन उसके मन में एक ही बात आती थी - गली के कुत्ते भूखे कैसे सोते होंगे? बस फिर क्या था, जो थोड़ा दूध बचता, एक-दो ब्रेड के पैकेट लेकर वह रात 11 बजे चुपचाप घर से निकल जाता। दोस्तपुरा की सुनसान गलियों में घूम-घूम कर कुत्तों को खिलाता। लोग हंसते थे, कहते थे - खुद की स्थिति सही नहीं है, चला है कुत्तों को पालने। लेकिन दीपक नहीं रुका। आज 10 साल बाद भी, सर्दी, गर्मी, बरसात - उसकी ये रात की ड्यूटी कभी नहीं छूटी। गली के कुत्ते भी उसे देखते ही पूंछ हिलाने लगते हैं, जैसे अपने मालिक का इंतजार कर रहे हों।
बोर्ड का फाइनल पेपर छोड़ दिया
दीपक के जुनून की सबसे बड़ी कहानी उसके 12वीं के बोर्ड एग्जाम वाली है। फाइनल पेपर था, जो जिंदगी तय करता है। वह पेपर देने जा रहा था, तभी रास्ते में एक घायल गाय तड़पती मिली। किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी थी। लोग देखकर निकल रहे थे।
एक तरफ करियर का सबसे बड़ा पेपर, दूसरी तरफ एक बेजुबान की जिंदगी। दीपक वहीं गाय के पास बैठ गया। पानी लाया, मरहम-पट्टी की कोशिश की, लोगों से मदद मांगी। इस सब में उसका पेपर छूट गया।घर आकर बहुत डांट पड़ी। घर वाले और परेशान हो गए। बोले अपना भविष्य तो देख। पर दीपक ने एक ही बात कही, पेपर तो मैं अगले साल फिर दे दूंगा, पर उस गाय की जान चली जाती तो वापस नहीं आती।
35 साल का हो गया, शादी से भागता है
आज दीपक 35 साल का हो चुका है। घर वालों की अब एक ही चिंता है - इसकी शादी। जब उससे पूछते हैं कि शादी क्यों नहीं करनी, तो वह हंसकर टाल देता है। वह कहता है, मुझे अभी शादी नहीं करनी। मुझे बस सेवा कार्य करना है। मैं शादी करके एक परिवार में बंध जाऊंगा, फिर इन बेजुबानों का कौन देखेगा?
दोस्तपुरा का 'एनिमल एम्बुलेंस'
आज के जमाने में जहां लोग एक पौधा लगाकर 10 फोटो डालते हैं, दीपक ने आज तक अपने काम की एक फोटो भी खुद नहीं डाली। दोस्तपुरा के लोग अब उसे इज्जत से देखते हैं। जो लोग पहले हंसते थे, वही अब कहते हैं - जिस घर की खुद छत कच्ची हो, उस घर का लड़का दूसरों को छाया दे रहा है। कोटा शहर को ऐसे ही स्वयंसेवकों की जरूरत है। दीपक महावर की कहानी बताती है कि बड़ा आदमी बनने के लिए बड़े घर की नहीं, बड़े दिल की जरूरत होती है।

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