निर्दलीयों का दम: दो चुनावों में बदला जयपुर निगम का सियासी गणित, 2020 में 23 निर्दलीय पहुंचे थे निगम, 2026 में टिकट कटने से बागियों ने बढ़ाई भाजपा-कांग्रेस की चिंता
परिसीमन और टिकट कटने से नाराज बागियों ने बढ़ाई मुख्य दलों की चिंता
जयपुर। जयपुर नगर निगम चुनावों में निर्दलीय प्रत्याशी अब केवल वोट काटने वाले उम्मीदवार नहीं रह गए हैं, बल्कि कई मौकों पर सत्ता के समीकरण बदलने की ताकत दिखा चुके हैं। 2020 के चुनाव में जयपुर ग्रेटर और हेरिटेज के 250 वार्डों में कुल 23 निर्दलीय प्रत्याशी जीतकर पार्षद बने थे। इस बार निगम के एकीकरण और परिसीमन के बाद वार्डों की संख्या घटकर 150 रह गई है, लेकिन निर्दलीयों की संख्या रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। नामांकन के बाद सात सौ से ज्यादा निर्दलीय मैदान में हैं।
2020 में हेरिटेज में निर्दलीय बने थे किंगमेकर: 2020 का चुनाव निर्दलीयों की प्रभावशीलता का सबसे बड़ा उदाहरण रहा। जयपुर हेरिटेज में कांग्रेस को 47 और भाजपा को 42 सीटें मिली थीं, जबकि 11 निर्दलीय जीते। बहुमत के लिए 51 पार्षद जरूरी थे। ऐसे में बोर्ड गठन और महापौर चुनाव में निर्दलीयों की भूमिका निर्णायक हो गई। महापौर चुनाव में कम से कम नौ निर्दलीयों ने कांग्रेस की मुनेश गुर्जर के पक्ष में मतदान किया और कांग्रेस का बोर्ड बन गया। यही नहीं, 2020 में निर्दलीय जीतीं कुसुम यादव बाद में जयपुर हेरिटेज की महापौर बनीं। 2024 में कांग्रेस के आठ पार्षद भाजपा में शामिल होने के बाद भाजपा ने उन्हें कार्यवाहक महापौर बनाया। यानी निर्दलीय के रूप में जीती एक पार्षद का राजनीतिक सफर आगे चलकर निगम के सत्ता समीकरण का केन्द्र बन गया।
तस्वीर ज्यादा चुनौतीपूर्ण
2026 में हालात अलग हैं। एकीकृत जयपुर नगर निगम में 150 वार्ड हैं। परिसीमन और आरक्षण ने कई पुराने राजनीतिक समीकरण बदल दिए हैं। भाजपा-कांग्रेस ने भी 2020 में जीते 250 पार्षदों में से महज 43 को दोबारा टिकट दिया है। इनमें 23 निर्दलीय विजेताओं में से केवल तीन को इस बार प्रमुख दलों ने टिकट दिया। इससे टिकट से वंचित दावेदारों के निर्दलीय मैदान में उतरने का रास्ता खुला। नामांकन के दौरान 953 निर्दलीयों ने पर्चे दाखिल किए थे और जांच व वापसी के बाद सात सौ से ज्यादा चुनाव मैदान में बचे।
इस बार कई वार्डों में त्रिकोणीय पेंच
इस बार निर्दलीयों की सबसे बड़ी ताकत स्थानीय पहचान और पार्टी के बागियों का नेटवर्क है। कई वार्डों में भाजपा-कांग्रेस के असंतुष्ट चेहरे निर्दलीय बनकर मुकाबले में हैं। नाम वापसी के लिए दोनों दलों को बागियों को मनाने की कवायद करनी पड़ी। कुछ वार्ड सीधे भाजपा-कांग्रेस मुकाबले वाले हैं, जबकि कई सीटों पर निर्दलीय प्रत्याशी मुकाबले को त्रिकोणीय बना रहे हैं।

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