'ओ रब्बा, कोई तो बताए प्यार होता है क्या...जैसे सदाबहार नगमों ने ताजा की पुरानी यादें, देर रात तक जमे रहे श्रोता
'एक शाम शहीदों के नाम' में सुरों से सजा मंच
कोटा । 'ओ रब्बा, कोई तो बताए प्यार होता है क्या...' गाने की धुन छिड़ते ही विजयश्री रंगमंच तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। कोई गीत के बोलों में खो गया, तो कोई अपने पुराने दिनों की यादों में लौट गया। कभी ह्यभारत माता की जयह्ण के नारों से माहौल जोश से भर उठा, तो कभी सदाबहार नगमों ने श्रोताओं को सुरों की दुनिया में पहुंचा दिया। मौका था राष्ट्रीय दशहरा मेले में शनिवार रात आयोजित ह्यएक शाम शहीदों के नामह्ण का, जहां पद्मश्री पार्श्वगायक सुरेश वाडेकर ने अपनी सुरीली आवाज से ऐसा समां बांधा कि दर्शक देर रात तक अपनी जगह पर जमे रहे।
रात करीब साढ़े आठ बजे शुरू हुई सांस्कृतिक संध्या में सुरेश वाडेकर ने जैसे ही सुरों का सफर शुरू किया, पूरा पांडाल संगीत की लहरियों में डूब गया। उनकी आवाज में देशभक्ति का जज्बा भी था और पुराने गीतों की मिठास भी। हर प्रस्तुति के बाद गूंजती तालियां और दर्शकों की फरमाइशें बता रही थीं कि श्रोता इस शाम को लंबे समय तक याद रखने वाले हैं।
कभी मोहब्बत के तराने, कभी पुरानी यादों का कारवां -
देशभक्ति के रंगों के बीच सुरेश वाडेकर ने अपने लोकप्रिय फिल्मी गीतों से संगीत प्रेमियों को यादों की गलियों में भी पहुंचाया। 'मैं देर करता नहीं, देर हो जाती है' की प्रस्तुति पर पांडाल तालियों से गूंज उठा। वहीं 'और इस दिल में क्या रखा है', 'मैं हूं प्रेम रोगी, मेरी दवा तो कराओ', 'लगी आज सावन की झड़ी', 'राम तेरी गंगा मैली हो गई' और 'ओ तुमसे मिलके ऐसा लगा' जैसे गीतों ने पुराने दौर की मधुर यादें ताजा कर दीं।
'ओ रब्बा कोई तो बताए प्यार होता है क्या' सुनते ही माहौल में अलग ही रंग नजर आया। गीत के बोलों के साथ श्रोता सुरों में खोते चले गए। किसी के चेहरे पर मुस्कान थी, तो कोई गीत की धुन के साथ तालियां बजाता नजर आया। वाडेकर की गायकी ने साबित कर दिया कि सदाबहार गीतों का जादू वक्त के साथ कम नहीं होता।

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