चार साल से 25 करोड़ का इंतजार, न कैफेटेरिया बना, न एनक्लोजर
प्रदेश का सबसे बड़ा पार्क फिर भी सुविधाओं में पिछड़ा
कोटा। राजस्थान का सबसे बड़ा अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क 4 साल से बजट को तरस रहा है। 25 करोड़ के बजट के अभाव में सुविधाएं विकसित नहीं हो पा रही। वहीं, रियासतकालीन चिड़ियाघर से वन्यजीवों की शिफ्टिंग भी अटकी पड़ी है। यहां न तो कैफेटेरिया है और न ही बड़े वन्यजीवों को रखनेके लिए एनक्लोजर। ऐसे में यहां आने वाले पर्यटकों को टिकट का पैसा अखर रहा है और वन विभाग को कोसते हुए मायूस लौट रहे हैं। दरअसल, अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में द्वितीय चरण के विकास कार्यों के लिए तत्कालीन सरकार में जायका प्रोजेक्ट के तहत 25 करोड़ रुपए दिए जाने थे,जो अब तक नहीं मिले। इसके बाद वर्तमान सरकार में हाल ही में मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ बजट दिए जाने की घोषणा हुई लेकिन राशि नहीं मिला। हालांकि, कार्य की डीपीआर तैयार करने के लिए मात्र 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से वन्यजीव प्रशासन ने 5 लाख टेंडर कर 11 एनक्लोजर की डिजाइन ड्राइंग बनवा ली है। अब काम शुरू करने के लिए बजट राशि मिलने का इंतजार हो रहा है।
30 करोड़ से बना था बायोलॉजिकल पार्क
वन्यजीव विभाग के उप वन संरक्षक अनुराग भटनागर ने बताया कि वर्ष 2017 में 30 करोड़ की लागत से बायोलॉजिकल पार्क का निर्माण कार्य शुरू हुआ था। जिसे 2019 में पूरा किया जाना था लेकिन कोविड के 2 साल के कारण काम समय पर पूरा नहीं हो सका। इसके बाद 21 नवंबर 2021 को प्रथम चरण का काम पूरा हुआ था।
प्रथम चरण में यह हुए कार्य
बायोलॉजिकल पार्क में कुल 35 एनक्लोजर बनने थे। जिसमें से प्रथम चरण में 8 मांसाहारी, 5 शाकाहारी तथा 5 पक्षियों के बनाए गए हैं। शेष एनक्लोजर बजट के अभाव में नहीं बन पाए। जिसकी वजह से चिड़ियाघर के दो दर्जन से अधिक वन्यजीव शिफ्ट नहीं हो सके।
आॅपरेशन या पोस्टमार्टम के लिए 16 किमी का चक्कर
बायोलॉजिकल पार्क में तैनात वनकर्मियों ने बताया कि वेटनरी हॉस्पिटल नहीं होने से वन्यजीवों के इलाज में परेशानी होती है। इलाज के संबंधित कुछ उपकरण बायोलॉजिकल पार्क में तो कुछ चिड़ियाघर में हैं। वन्यजीवों को यदि दवाइयां देनी हो तो यहां से दे देते हैं लेकिन आॅपरेशन या पोस्टमार्टम करना हो तो उसे करीब 16 किमी दूर चिड़ियाघर लाना होता है। ऐसे में कई बार वन्यजीवों को समय पर इलाज मुहैया करवाना काफी चुनौतिपूर्ण हो जाता है।
द्वितीय चरण में यह होने हैं कार्य
पार्क में द्वितीय चरण के तहत 25 करोड़ की लागत से करीब 17 एनक्लोजर, स्टाफ क्वार्टर, कैफेटेरिया, वेटनरी हॉस्पिटल, इंटरपिटेक्शन सेंटर, पर्यटकों के लिए आॅडिटोरियम हॉल, छांव के लिए शेड, कुछ जगहों पर पथ-वे सहित अन्य कार्य शामिल हैं।
चिड़ियाघर से नहीं हो पा रही शिफ्टिंग
बायोलॉजिकल पार्क के निर्माण के दौरान 44 एनक्लोजर बनने थे लेकिन प्रथम चरण में मात्र 13 ही बन पाए। जबकि, 31 एनक्लोजर अभी बनने बाकी हैं। जब तक यह एनक्लोजर नहीं बनेंगे तब तक पुराने चिड़ियाघर में मौजूद अजगर, घड़ियाल, मगरमच्छ, बंदर व कछुए सहित एक दर्जन से अधिक वन्यजीव बायलॉजिकल पार्क में शिफ्ट नहीं हो पाएंगे।
पर्यटकों में नाराजगी, अखर रहा टिकट का पैसा
वर्तमान में बायोलॉजिलक पार्क में शाकाहारी व मांसाहारी मिलाकर करीब 70 से ज्यादा वन्यजीव हैं। यहां आने वाले पर्यटक 55 रुपए खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, लोमड़ी, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बड़े वन्यजीव का दीदार नहीं कर पाने से निराश होकर लौट रहे हैं। वहीं, कैफेटेरिया सुविधा नहीं होने से लोगों को चाय-नाश्ते के लिए परेशान होना पड़ता है। इसके अलावा र्प्यटकों के बैठने के लिए छायादार शेड भी र्प्याप्त नहीं हैं।
पर्यटक बोले-न टाइगर न लॉयन, समय होता बर्बाद
बोरखेड़ा निवासी अजय कुश्वाह ने बताया कि गत गुरुवार को परिवार के साथ बायोलॉजिकल पार्क गए थे। यहां प्रत्येक सदस्य के 55 रुपए टिकट लेने के बावजूद अंदर कोई बड़ा वन्यजीव नहीं दिखा। लॉयन व टाइगर नहीं होने से बच्चे मायूस हो गए। पैंथर है लेकिन वह भी पेड़ की आड़ में ही बैठा रहता है।बड़े एनिमल नहीं होने से पैसे और समय की बर्बादी है। वहीं, कुन्हाड़ी निवासी हरमित सांखला व प्रमोद कुमार कहना है कि पार्क के नाम पर वन विभाग पर्यटकों की जेब काट रहा है। पैसा खर्च करने के बावजूद बब्बर शेर, टाइगर, मगरमच्छ, घड़ियाल, अजगर सहित अन्य बडेÞ वन्यजीव देखने को नहीं मिले। दादाबाड़ी निवासी कैशव दत्ता, रामगोपाल शर्मा, हेमलता कंवर, प्रियंका नंदवाना का कहना था कि यहां गिनती के जानवर हैं और बैठने के लिए पर्याप्त बैंच भी नहीं है। कुछ झूले लगे हैं, उनमें से भी कुछ खराब हो रहे। एनीमल के साथ प्ले जॉन में सुविधाएं बढ़ानी चाहिए।
इनका कहना है
अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क के द्वितीय चरण के विकास कार्य के लिए मुख्यमंत्री बजट घोषणा में 25 करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ है। डीपीआर तैयार करवाने के लिए ही 20 लाख रुपए की राशि मिली है। जिसमें से 5 लाख रुपए का टेंडर कर 11 एनक्लोजर की ड्रॉइंन डिजाइन बनवा ली है लेकिन कार्य बजट राशि प्राप्त होने पर हो सकेंगे। हालांकि बजट राशि के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र लिखा है। जल्द बजट मिलने की उम्मीद है।
- अनुराग भटनागर, डीएफओ वन्यजीव विभाग कोटा

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