भारत-बांग्लादेश संबंधों के नए अध्याय की शुरुआत: ढाका में दिनेश त्रिवेदी की तैनाती, जल बंटवारे से सुरक्षा तक कई मुद्दे अहम
भारत-बांग्लादेश रिश्तों की नई परीक्षा शुरू
ढाका। बांग्लादेश में भारत के नए उच्चायुक्त दिनेश त्रिवेदी शुक्रवार को यहां से बांग्लादेश के लिए उड़ान भरेंगे और उनकी यह रवानगी एक ऐसे संवेदनशील मोड़ पर हो रही है, जब दोनों पक्ष राजनीतिक बदलावों, उभरते रणनीतिक तनाव तथा आने वाले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को आकार देने वाली कई महत्वपूर्ण वार्ताओं के बीच अपने रिश्तों को नए सिरे से स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। त्रिवेदी ने ढाका रवाना होने से पहले मीडिया से कहा कि दोनों देशों पर लगभग 160 करोड़ लोगों की आकांक्षाओं को पूरा करने की जिम्मेदारी है। उन्होंने भारत एवं बांग्लादेश के रिश्ते को 'विशेष' बताया और कहा कि इसने राजनीतिक बदलावों तथा समय-समय पर पैदा होने वाले तनावों को झेला है। यह मजबूत एवं सुरक्षित नींव पर टिका है।
केंद्र सरकार में रेल मंत्री रह चुके त्रिवेदी ऐसे समय में ढाका पहुंचेंगे जब द्विपक्षीय संबंधों के दो सबसे महत्वपूर्ण स्तंभों (जल बंटवारे और व्यापार) पर नए सिरे से बातचीत शुरू होने वाली है। गंगा के जल बंटवारे की 1996 संधि का नवीनीकरण होना है, लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में व्यापक स्तर पर फिर से बातचीत करना मुश्किल साबित हो सकता है, जिससे अल्पावधि के लिए इस संधि को कुछ समय के लिए आगे बढ़ा देना ही सबसे संभावित परिणाम दिखाई देता है। विदेश मंत्रालय में पूर्व सचिव पिनाक आर चक्रवर्ती और अन्य रणनीतिक पर्यवेक्षकों ने तर्क दिया है कि पानी को व्यापक संबंधों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
भारतीय नीति निर्माता अब बदलती परिस्थितियों को देखते हुए इस संधि पर दोबारा विचार करना जरूरी समझ रहे हैं। हिमालय में ग्लेशियरों के कम पिघलने से नदियों के प्रवाह पर असर पड़ा है, जबकि जनसंख्या वृद्धि और कृषि मांग ने सीमा के दोनों ओर पानी की आवश्यकताओं को नाटकीय रूप से बढ़ा दिया है। जल बंटवारे पर वार्ता व्यापक आर्थिक चर्चाओं से भी जुड़ी हुई है। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था, जो अब 510 अरब अमेरिकी डॉलर को पार कर चुकी है, लगातार मध्यम आय वाले देश के दर्जे की ओर बढ़ रही है।
चूंकि बांग्लादेश सबसे कम विकसित देशों की श्रेणी से बाहर निकल रहा है, इसलिए भारत द्वारा पिछले कुछ वर्षों में एकतरफा रूप से दी गई कई व्यापारिक रियायतों और तरजीही व्यवस्थाओं में अनिवार्य रूप से संशोधन की आवश्यकता होगी। इसलिए, दोनों देशों के अधिकारी एक अधिक संतुलित रिश्ते के लिए डिज़ाइन किए गए एक नए व्यापार ढांचे की तलाश कर रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में दोनों पक्षों को राजनीतिक रूप से परेशान करने वाले मुद्दों को संभालने की आवश्यकता होगी। जमात-ए-इस्लामी और नेशनल सिटीजंस पार्टी के कुछ धड़ों की भारत-विरोधी बयानबाजी ने भारत में चिंता पैदा की है। इसके बावजूद भारतीय अधिकारी इस बात को स्वीकार करते हैं कि समय-समय पर आने वाले राजनीतिक बयानों को भूगोल, अर्थशास्त्र और लोगों के आपसी रिश्तों पर बने इस रिश्ते को पटरी से उतारने की अनुमति नहीं दी जा सकती। त्रिवेदी के लिए यह चुनौती होगी कि वह दोनों देशों के रिश्तों को राजनीतिक उतार-चढ़ाव से बचाकर रखें।
भारत बांग्लादेश के चीन और पाकिस्तान के साथ बढ़ते रिश्तों को लेकर भी लगातार सावधान है। यह चिंता सबसे ज्यादा नदी से जुड़े मुद्दों में दिख रही है। गंगा नदी के जल बंटवारे पर बातचीत चल रही है, लेकिन बांग्लादेश ने तीस्ता नदी के प्रबंधन और परियोजनाओं में चीन की मदद मांगी है। इस प्रस्ताव से भारत चिंतित है, क्योंकि यह परियोजना सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के बहुत पास है। सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं सिर्फ चीन तक ही सीमित नहीं हैं। हाल ही में बांग्लादेश और पाकिस्तान के बीच बढ़ते सैन्य संपर्क—जैसे पायलट प्रशिक्षण पर बातचीत और पाकिस्तान के लड़ाकू विमानों में बांग्लादेश की रुचि—ने भारत को सतर्क कर दिया है। साथ ही, खुफिया एजेंसियां बांग्लादेश में पाकिस्तान की आईएसआई की बढ़ती गतिविधियों पर भी नजर रख रही हैं।
ये चिंताएं पुराने अनुभवों से भी जुड़ी हैं। भारतीय एजेंसियां लंबे समय से मानती हैं कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों ने पहले पूर्वोत्तर भारत के उग्रवादी समूहों की मदद की थी। 2002 में कोलकाता के अमेरिकन सेंटर पर हुए हमले जैसी घटनाओं की जांच में भी पाकिस्तान और बांग्लादेश के कुछ चरमपंथी संगठनों के संबंध सामने आए थे। फिर भी, इन चिंताओं के बावजूद दोनों देश लंबे समय तक खराब रिश्ते नहीं रख सकते। बांग्लादेश, दक्षिण एशिया में भारत का एक बड़ा व्यापारिक साझेदार है और बंगाल की खाड़ी तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण रास्ता भी है। वहीं, भारत भी बांग्लादेश के लिए संपर्क, ऊर्जा और क्षेत्रीय बाजारों तक पहुंच के लिहाज से बहुत जरूरी है। इसलिए त्रिवेदी के लिए असली काम मतभेद खत्म करना नहीं, बल्कि उन्हें संभालकर रिश्तों को आगे बढ़ाना होगा।
आखिर में, इस बातचीत की सफलता इस पर निर्भर करेगी कि क्या भारत और बांग्लादेश राजनीतिक तनाव से ऊपर उठकर बदलती परिस्थितियों के अनुसार अपने रिश्तों को नया रूप दे पाते हैं। दोनों देशों के करोड़ों लोगों की तरक्की एक-दूसरे से जुड़ी हुई है, इसलिए सहयोग बनाए रखना बहुत जरूरी है।

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