पश्चिम बंगाल के मछुआरों ने उठाई पारंपरिक मत्स्य अधिकारों की सुरक्षा, जलवायु बीमा, सामाजिक सुरक्षा और तटीय विकास में भागीदारी की मांग
पारंपरिक मत्स्य अधिकारों और भूमि संरक्षण की मांग
कोलकाता। भारत की 'लघु एवं कुटीर मत्स्य पालन राष्ट्रीय कार्य योजना' (एनपीओए-एसएसएफ) के सिलसिले में हुई बैठकों के दौरान पश्चिम बंगाल के आर्थिक रूप से कमजोर मछुआरों की तरफ से पारंपरिक मत्स्य अधिकारों की सुरक्षा, जलवायु-जोखिम बीमा, मजबूत सामाजिक सुरक्षा और तटीय विकास के फैसलों में अधिक भागीदारी की मुख्य मांगें सामने आई हैं। डायमंड हार्बर में शुक्रवार को दक्षिण 24 परगना जिले के साथ-साथ तटीय इलाकों और नदियों के मुहाने पर बसे समुदायों के 70 प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। आर्थिक रूप से कमजोर इन मछुआरों ने मत्स्य अधिकारों, कल्याणकारी योजनाओं के लाभ, आपदा प्रबंधन की तैयारियों और तटीय नीतियों में महिलाओं की भागीदारी से जुड़ी अपनी समस्याओं को प्रमुखता से सामने रखा।
केंद्रीय मत्स्य पालन विभाग तटीय राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में इस सामुदायिक परामर्श प्रक्रिया का नेतृत्व कर रहा है, जबकि 'बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन' (बीओबीपी-आईजीओ) सचिवालय और सुविधा प्रदाता के रूप में काम कर रहा है। बीओबीपी-आईजीओ के सहयोग से पूर्वी तट मत्स्य श्रमिक संघ की ओर से आयोजित इस परामर्श ने जमीनी स्तर की चिंताओं को राष्ट्रीय नीति प्रक्रिया में शामिल किया।
प्रतिनिधियों ने पारंपरिक मत्स्य अधिकारों और पुस्तैनी जमीन-जायदाद के हक की पुख्ता सुरक्षा की मांग की। उन्होंने कहा कि मछुआरा आबादी को प्रभावित करने वाली किसी भी तटीय विकास योजना को शुरू करने से पहले, स्थानीय लोगों को पूरी जानकारी देकर उनकी बिना शर्त मंजूरी लेना अनिवार्य किया जाए। मौसम की मार से आजीविका पर गहराते संकट को देखते हुए प्रतिनिधियों ने प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए विशेष बीमा योजनाओं, बेहतर स्वास्थ्य बीमा और पुख्ता सामाजिक सुरक्षा कवच की मांग उठाई। इसके अलावा उन्होंने सरकारी योजनाओं के लाभ और औपचारिक पहचान के लिए मछुआरा पहचान पत्र आसानी से जारी करने तथा तटीय बस्तियों में एकीकृत बाल विकास सेवाओं (आईसीडीएस) को और बेहतर बनाने की गुहार लगाई।
आपदा की तैयारी और प्रतिक्रिया में महिलाओं की प्रभावी भागीदारी के साथ ग्राम-स्तरीय आपदा प्रबंधन समितियों को मजबूत करना एक अन्य प्रमुख सिफारिश थी। महिला मत्स्य श्रमिकों ने परामर्श में सक्रिय रूप से भाग लिया और मत्स्य पालन में लगी महिलाओं की फसल कटाई/पकड़ने के बाद की चुनौतियों और आर्थिक चिंताओं को उन चर्चाओं में रखा, जिनमें अक्सर केवल मछली पकड़ने के संचालन और समुद्री संसाधनों तक पहुंच का ही वर्चस्व रहता है। प्रतिनिधियों ने समावेशी निर्णय लेने, सामाजिक सुरक्षा और क्षमता निर्माण पर जोर दिया, ताकि मछुआरों को उनके अधिकारों को समझने, सरकारी योजनाओं तक पहुंच बनाने और सार्वजनिक संस्थानों के साथ प्रभावी ढंग से जुड़ने में मदद मिल सके।
डायमंड हार्बर की बैठक पश्चिम बंगाल भर में परामर्शों की शृंखला में तीसरी बैठक थी। यह प्रक्रिया छह अक्टूबर को काकद्वीप फिशिंग हार्बर में शुरू हुई थी, जिसमें सुंदरवन, काकद्वीप, नामखाना और सागर क्षेत्र शामिल थे। दूसरा परामर्श आठ अक्टूबर को कांथी-दादन पात्रबार फिश लैंडिंग सेंटर में आयोजित किया गया था, जिसमें पूर्व मेदिनीपुर जिला शामिल था। डायमंड हार्बर में नौ अक्टूबर की बैठक में दक्षिण 24 परगना शामिल था, जिसमें अन्य संबंधित तटीय और नदी के मुहाने पर रहने वाले मत्स्य समूहों की भागीदारी थी।
ये सिफारिशें भारत के एनपीओए-एसएसएफ को विकसित करने की राष्ट्रीय प्रक्रिया में योगदान देंगी और खाद्य एवं कृषि संगठन के 'सतत छोटे पैमाने के मत्स्य पालन को सुरक्षित करने के लिए स्वैच्छिक दिशा-निर्देशों' के कार्यान्वयन का समर्थन करेंगी। इस कार्य के लिए गठित राष्ट्रीय कार्यबल का नवंबर के मध्य/शुरुआत में मसौदा योजना में इन परामर्शों के निष्कर्षों को शामिल करने का कार्यक्रम है। 21 नवंबर, 2026 को सार्वजनिक परामर्श के लिए मसौदा प्रस्तुत करने का कार्यक्रम है, जिसके बाद समीक्षा, अंतिम रूप देना और अधिसूचना जारी की जाएगी।

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