ग्लेशियर झीलों का विस्तार तबाही का संकेत
जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन से ग्लेशियरों के पिघलने की गति जिस तेजी से बढ़ रही है, उसी गति से ग्लेशियर झीलों की तादाद भी बढ़ रही है। इस हिमालयी इलाके में ग्लेशियर झीलों की बेतहाशा बढ़ती तादाद निचले इलाकों में रहने वालों के लिए भीषण खतरा बन गई है। उच्च हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर झीलों के आकार में तेजी से हो रही बढ़ोतरी ने वैज्ञानिकों और प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है। वैज्ञानिकों के अध्ययन इस बात के जीते-जागते सबूत हैं कि ग्लेशियर झीलों के विस्तार भविष्य में 2013 की केदारनाथ त्रासदी जैसी भीषण आपदा का सबब बन सकती है। इसलिए इस पर तत्काल अंकुश लगाए जाने की जरूरत है। यदि हिमालयी राज्य उत्तराखंड को लें, तो इसके उच्च हिमालयी क्षेत्र में लगभग 1266 से भी अधिक ग्लेशियर झीलें हैं। इनमें 13 तो बेहद खतरनाक हैं। इनमें भी पांच उच्च जोखिम वाली क्षेणी में हैं। इनमें बहुतेरी झीलें ऐसी हैं, जो विभिन्न कारणों से बनती-बिगड़ती रहती हैं। इनमें चमोली जिले में वसुधारा और पिथौरागढ जिले में माबान, प्युंगू व दो अनाम झीलें हैं जो कभी भी भीषण आपदा का सबब बन सकती हैं। हाल ही में एक नई आफत दस्तक दे रही है। वह यह है कि पिथौरागढ़ की दारमा घाटी के ऊपर करीब सात सौ मीटर लम्बी और छह सौ मीटर चौड़ी ग्लेशियर झील ने वैज्ञानिकों को अचरज में डाल दिया है।
खतरनाक स्तर पर :
सबसे बड़ी चिंतनीय बात यह है कि इस झील के आकार में बीते दिनों करीब तीस फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज हुई है। केन्द्रीय जल आयोग की रिपोर्ट के मुताबिक अकेले अरुणाचल में 197 से ज्यादा ग्लेशियर झीलें हैं। ये अपना खतरनाक स्तर पर विस्तार कर रही हैं। इनके बाद लद्दाख में 120, जम्मू-कश्मीर में 57, सिक्किम में 47, हिमाचल में 6 और उत्तराखंड में 5 झीलें हैं। कुल मिलाकर 2025 में ही 1,435 ग्लेशियर झीलों का विस्तार हुआ है, जो तबाही का संकेत है। उत्तराखंड की इन खतरनाक 13 झीलों को तीन श्रेणियों में बांटा है। ए श्रेणी में चमोली की वसुधारा, उत्तरकाशी की केदारताल, बागेश्वर की नागकुंड,पिथौरागढ की मबांग, प्यंगरू और टिहरी की मासुरीताल प्रमुख हैं। पिछले दिनों में गंगोत्री की केदारताल और चमोली में वसुतारा झील का काफी विस्तार हुआ है। इन झीलों के गढ़वाल विश्व विद्यालय के भूगर्भ विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डा. एम पी एस बिष्ट द्वारा वर्ष 2014 और 2023 के उपग्रह चित्रों के अध्ययन से यह चिंताजनक खुलासा हुआ है। उनके मुताबिक ये झीलें हिमनद के असंगठित मलबे - मोराइन डैम की रुकावट से बनी हैं। इनसे खतरा यह है कि हिमजल में बढ़ोतरी या अतिवृष्टि से पानी बढ़ने पर ये फूटकर बड़े खतरे का सबब बन सकती हैं। उनका मानना है कि इस खतरे को देखते हुए सरकारों और अन्य वैज्ञानिक संस्थानों को समय रहते इन झीलों का आकलन कर तत्काल कदम उठाए जाने की जरूरत है।
सर्वे के मुताबिक :
असलियत मे उत्तरकाशी की धराली की घटना ने उत्तराखंड के उच्च हिमालयी क्षेत्रों में ग्लेशियर झीलों के बढ़ते खतरे को चर्चा में ला दिया है। ग्लेशियर झीलों का मुद्दा 2013 में केदारनाथ आपदा के समय महत्वपूर्ण बन गया, जबकि चौराबाडी ग्लेशियर की झील के फटने से तबाही आई थी। जियोलॉजिकल सर्वे आफ इंडिया के मुताबिक उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में लगभग 968 ग्लेशियर हैं, जिनमें 12000 ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं। देखा गया है कि आये -दिन उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियर से बनने वाली झीलों में जरूरत से ज्यादा पानी आने के कारण बाढ़ का खतरा मंडराता रहता है। शोध में खुलासा हुआ है कि इन झीलों में पानी बढ़ने से इनका आकार तेजी से विकराल रूप लेता जा रहा है। 2021 में हिमनद का एक हिस्सा टूटने से चमोली में धौलीगंगा नदी में बाढ़ और 2013 में केदारनाथ त्रासदी इसकी जीती-जागती मिसाल है। दरअसल ग्लेशियर के आगे बनने वाली झील को प्रोग्रेसिव लेक कहते हैं। ये झीलें इसलिए अधिक संवेदनशील होती हैं, क्योंकि इनके टूटने का खतरा ज्यादा होता है। इसीलिए इन झीलों को गंभीरता से लेने की जरूरत है। चूंकि हिमालयन क्षेत्र भूकंपीय दृष्टि से काफी संवेदनशील है, इसलिए यह खतरा और बढ़ जाता है। यही वजह है कि वैज्ञानिक और पर्यावरणविद हिमालयी अंचल में बनी इन झीलों से आने वाले भीषण खतरों के प्रति चिंतित हैं।
जलवायु परिवर्तन :
सबसे बड़ी बात यह है कि जलवायु परिवर्तन के कारण तापमान काफी बढ़ रहा है और मौसम के पैटर्न में भी बदलाव आ रहा है। वह बात दीगर है कि इस पर बहुत सारे अध्ययन और शोध जारी हैं, लेकिन हकीकत यह है कि मौसम के इस बदलते पैटर्न के बारे में बहुत कुछ समझना अभी भी बाकी है। इसलिए इस दिशा में पिछले तकरीबन तीस सालों के आंकड़ों का गहनता से आंकलन बेहद जरूरी है। अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि हिमालय में वायु प्रदूषण पर जीवाश्म ईंधन के जलने का ज्यादा असर पड़ रहा है। हिमालय अंचल में गाड़ियों की बेतहाशा कई गुणा बढ़ती तादाद हवा में जीवाश्म ईंधन की हिस्सेदारी का अहम कारण है। साथ ही हिमालय बस्तियों और शहरों के बढ़ते बोझ से अब हांफने लगा है। वहीं ग्लोबल वार्मिंग के चलते तेजी से ग्लेशियर पिघलकर बनी झीलें जल प्रलय को आमंत्रण दे रही हैं। इस मामले में इसरो की मानें तो हिमालय क्षेत्र की 2432 ग्लेशियर झीलों में से 672 झीलों का तो आकार तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। इनमें से भारत में मौजूद 130 झीलों के टूटने का खतरा हमेशा बना हुआ है, जिससे भारी तबाही की आशंका है। इस सच्चाई को झुठलाया नहीं जा सकता। इसमें दो राय नहीं कि दिनोंदिन बढ़ते तापमान और जलवायु परिवर्तन की आंधी ग्लेशियरों के विनाश का सबब बन रही है।
-ज्ञानेन्द्र रावत
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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