जानिए क्या है राजकाज में खास
कहावत है कि सांप निकलने के बाद लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन हमारे पूर्व विधायकों को इस पर कतई विश्वास नहीं है।
चर्चा में विचारधारा
इन दिनों सूबे में विचारधारा की चर्चा जोरों पर है। हो भी क्यों ना, विचारधारा से जुड़े लोग हर जगह फटे में टांग अड़ाने में माहिर जो हैं। अब देखो ना, पिछले दिनों पिंकसिटी में 60 सीटों के लिए हुए समाज विशेष के चुनावों में भी एक विचारधारा से जुड़े लोगों ने अपना अड़ंगा लगाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। भाई लोगों ने अपनी विचारधारा से जुड़े 40 लोगों का अलग से पैनल बना कर पूरे शहर में घूमे। पहले तो पैनल को कांग्रेस और भाजपा से जोड़कर प्रचारित किया गया, लेकिन जब मामला बिगड़ता नजर आया, तो इसे दो संप्रदायों से जोड़ दिया। भाई लोगों ने नारा दिया कि जो सूबे की सबसे बड़ी पंचायत के लिए हुई जंग में आदर्शनगर वाले पंच के साथ थे, उनकी तरफ देखना भी पाप है, चूंकि अब मामला सनातन से जुड़ चुका है।
कृपा बालाजी की
पूंछरी के लोटा वालों की जिस पर कृपा हो जाए, उसकी बल्ले-बल्ले है। भगवा पार्टी वाले भाई साहब पर बालाजी की कृपा है। उसकी वजह से अच्छे-अच्छों की बोलती बंद है। पांच महीने से हालात ज्यों के त्यों हैं। न तिल घटे, न राई बढ़े। लाख कोशिशों के बाद भी नवरत्नों में जगह नहीं मिलने वाले भी समझ नहीं पा रहे कि क्या रास्ता निकाले? निर्णय पर अमल कराना कोई बच्चों का खेल नहीं। दिल्ली दरबार के चुनावों की आड़ ने कइयों को नई मुसीबत में डाल दिया। निर्णय पर अमल नहीं होने से उन पर भी संकट के बादल मंडराते दिख रहे हैं। अब भाई लोग उन्हें भी किसी बालाजी की शरण में जाने की सलाह देने लगे हैं।
अब आया खयाल
कहावत है कि सांप निकलने के बाद लकीर पीटने से कोई फायदा नहीं है, लेकिन हमारे पूर्व विधायकों को इस पर कतई विश्वास नहीं है। पांच साल तक सत्ता का सुख भोगते समय तो सूबे की प्रगति के बारे में सोचने का वक्त नहीं मिला। अब प्रगति के बारे में गहन चिन्तन मंथन हो रहा है। उनकी रातों की नींद और दिन का चैन गायब है। एक मंच पर आकर जोरदार चिन्ता जता रहे हैं। चिन्तन के लिए अधिवेशन तक बुलाने की तैयारी कर रहे हैं। उसका भी बढ़- चढ़कर ढिंढ़ोरा पीटा जा रहा है। राज का काज करने वाले भी कम नहीं हैं, वो भी चटकारे लेने से नहीं चूक रहे। बोल रहे हैं कि रही-सही कसर और पूरी करने के लिए कुछ न कुछ तो करना ही पड़ता है।
अभी सदमा चालू आहे
हाथ वाले भाई लोग अभी भी सदमे में हैं। वो समझ नहीं पा रहे कि जिन योजनाओं को लेकर फिर से राज में आने का सपना देखा था, उन्हें नए राज ने डेफर कर दिया। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर चर्चा है कि ऐसी दशा तो कभी नहीं देखी। अटारी वाले भाईसाहब ने एक ही झटके में सारी योजनाओं को गलत बताकर उन पर पानी फेर दिया और हमारे नेता हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। आखिर जनता को जस्टीफाई करने के लिए किसी नेता की जुबान तक नहीं खुली। सूबे के लोग बारहवें और चालीसवें के बाद सदमे से उबर जाते हैं, लेकिन यहां तो एक सौ साठवें के बाद भी घर से बाहर कदम नहीं निकले।
एक जुमला यह भी
हाथ वाले भाई लोगों को पार्टी के हिचकोले खा रहे जहाज को संभालने के लिए गोविन्द जी से अभी भी थोड़ी सी उम्मीद है। रंज के साथ दिए इस्तीफे में पीसीसी चीफ के कुर्सी थामे लक्ष्माणगढ़ वाले भाईसाहब ने बड़े नेताओं को आईना दिखाने में भी कोई कंजूसी नहीं की। इस्तीफे के बाद इंदिरा गांधी भवन में बने ठिकाने पर कई तरह की चर्चाएं हुईं थी। जो बातें पांच साल से मन में दबी थीं, अब वो भी बाहर आ गई थी। जो लोग भाईसाहब के किचन केबिनेट के सदस्य थे, वो कन्नी काटने लगे हैं। राज का काज करने वाले भी वक्त के तकाजे को समझते हैं। सबसे बुरी हालत तो अब उनकी है, जो भाईसाहब की आड़ में लोगों को आंख दिखा कर डराते रहे हैं।
-एल एल शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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