राज काज में क्या है खास, जानें

पहली पोस्टिंग और पहला सवाल

राज काज में क्या है खास, जानें
सचिवालय के गलियारों में इन दिनों एक नई चर्चा हवा पकड़ रही है। चर्चा भी और किसी को लेकर नहीं बल्कि दो महीने बाद मिलने वाले न्यू चीफ सेक्रेटरी से ताल्लुक रखती है।

सितारे, सचिवालय और समीकरण :

सचिवालय के गलियारों में इन दिनों एक नई चर्चा हवा पकड़ रही है। चर्चा भी और किसी को लेकर नहीं बल्कि दो महीने बाद मिलने वाले न्यू चीफ सेक्रेटरी से ताल्लुक रखती है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि मेष राशि वाले साहब के सितारे कुछ ज्यादा ही मेहरबान चल रहे हैं। ज्योतिषप्रेमियों का दावा है कि ग्रह नक्षत्र उनकी कुर्सी की दिशा तय कर चुके हैं। जबकि पॉलिटिक्स के जानकार इसे सीएम के भरोसे का प्रतिफल मान रहे हैं। दिलचस्प यह है कि फाइलों से ज्यादा इन दिनों राशिफल पढा जा रहा है। कोई मंगल की चाल देख रहा है, तो कोई सत्ता के मंगल की। ब्यूरोक्रैसी का अपना गणित है, जहां योग्यता, अनुभव और समीकरण का जोड़ बैठ जाए, वहीं किस्मत भी सलाम ठोक देती है। अब चीफ सेक्रेटरी की कुर्सी तक सचमुच मेष राशि पहुंचाती है, या सीएम का विश्वास, इसका फैसला तो वक्त करेगा, लेकिन फिलहाल सचिवालय में इतना तय है कि ग्रहों से ज्यादा नजरें कुर्सी की परिक्रमा कर रही हैं। हर कोई अपने-अपने ज्योतिषी से यही पूछ रहा है कि अगला योग किसका बन रहा है।

बयानों की बिसात और जादूगर जी की चाल :

सूबे की राजनीति में अगर किसी खिलाड़ी को चालों का पुराना उस्ताद कहा जाए, तो सूची में जोधपुर वाले भाई साहब का नाम सबसे ऊपर ही रहेगा। मेष राशि वालेजादूगर जी की खासियत यही मानी जाती है कि जो काम दाएं हाथ से करें, उसकी भनक बाएं हाथ तक को भी देर से लगे। इन दिनों उनके बयान भी ऐसे ही हैं। सियासी गलियारों में छोड़िए, चाय की थड़ी से लेकर इंदिरा गांधी भवन में बने पार्टी दफ्तर तक हर कोई उनका मतलब निकालने में जुटा है। हार्ड कोर वर्कर्स बतियाते हैं कि भाई साहब का बयान छोटा होता है, पर उसकी व्याख्या कई पन्नों की होती है। समर्थक उसे दूरदृष्टि बताते हैं। विरोधी उसे रणनीति का धुआं कहते हैं। भगवा से जुड़े राजनीतिक पंडित भी उनके हर शब्द में संकेत खोज रहे हैं। मानो बयान नहीं, कोई पहेली जारी हुई हो। फिलहाल इतना तय है कि जादूगर जी जब बोलते हैं, तो राजनीति सिर्फ सुनती नहीं, कई दिनों तक उसके मायने भी तलाशती है। यह उनकी शैली है, कम शब्द और ज्यादा हलचल।

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दिल्ली यात्रा और अफवाह एक्सप्रेस :

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अटारी वाले भाई साहब का दिल्ली दौरा तय होते ही राजधानी से ज्यादा सूबे का सियासी पारा चढ़ जाता है। टिकट उनका होता है, लेकिन उड़ान अफवाहें भरने लगती है। कोई कैबिनेट रिसफलिंग का कलैण्डर निकाल देता है, तो कोई राज की कुर्सी बदलने की पटकथा लिखने बैठ जाता है। उनके विरोधियों की कल्पना शक्ति ऐसी दौड़ती है कि लौटती फ्लाइट से पहले ही नए चेहरे की चर्चा शुरु हो जाती है। लेकिन हर बार कहानी वहीं आकर ठहर जाती है, जहां भरोसे की दीवार खड़ी है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिनों में बतियाते हैं कि अटारी वाले भाई साहब पर मोदी एंड सेन्ट्रल लीडरशिप का भरोसा मजबूत है। इसलिए अफवाहों के गुब्बारे उड़ते तो खूब हैं, मगर थोड़ी ऊंचाई के बाद खुद ही हवा छोड़ देते हैं। अब हाल यह है कि अफवाह फैलाने वाले भी पहले जितने उत्साहित नहीं दिखते। उन्हें भी समझ आने लगा है कि दिल्ली की हर यात्रा सत्ता परिवर्तन का टिकट नहीं होती। कई बार वह सिर्फ यात्रा ही होती है, बाकी कहानी तो राजनीतिक कल्पना भी लिखती रहती है। 

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पहली पोस्टिंग और पहला सवाल :

सूर्यनगरी के सियासी और प्रशासनिक गलियारों में इन दिनों एक किस्सा खूब तैर रहा है। चर्चा है कि पहली पोस्टिंग पर पहुंची, एक नई अधिकारी ने थाने का माहौल समझने के लिए ऐसा सवाल पूछ लिया कि सूनने वालों की भौंहें भी उठ गई और मुस्कान भी। अब किस्से में कितना सच है और कितना नमक-मिर्च, यह तो कहानी सुनाने वाले ही जानें, लेकिन चर्चा का बाजार खूब गर्म है। वैसे भी सरकारी गलियारों में अफवाहें अक्सर फाइलों से तेज दौड़ती हैं। एक वाक्य निकलता है और देखते ही देखते, उसके कई संस्करण तैयार हो जाते हैं। कोई इसे नए अफसर बेबाकी बता रहा है, कोई अनुभवहीनता का नमूना। कुल मिलाकर राज काज में कभी कभी चर्चा काम की कम और किस्सों की ज्यादा चलती है। आखिर सरकारी गलियारों का पुराना उसूल है कि यहां हर कहानी के कई लेखक होते हैं, लेकिन असली पटकथा किसने लिखी, यह राज ही रहता है।

-एल. एल. शर्मा

(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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