डीजे के इस्तेमाल पर उठ रहे सवाल
नियम और मानक मौजूद
आजकल धार्मिक जुलूसों, त्योहारों, शादी समारोहों और दूसरे सामाजिक आयोजनों में डीजे का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। कई जगहों पर संगीत की आवाज को उत्सव की भव्यता से जोड़ दिया गया है। जितनी तेज आवाज, उतना बड़ा आयोजन। इसे आयोजन की भव्यता का पैमाना मान लिया गया है। समस्या तब पैदा होती है जब मनोरंजन के लिए पैदा किया गया शोर लोगों के स्वास्थ्य और सामान्य जीवन पर असर डालने लगे। हाल ही देश के विभिन्न भागों में जिस तरह के मामले सामने आए, उसने ऐसे आयोजनों में डीजे के इस्तेमाल और तेज संगीत को लेकर चिंता बढ़ा दी है। उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में दूसरी कक्षा में पढ़ने वाली एक बच्ची की मौत का मामला हो, चाहे मध्यप्रदेश के बैतूल में एक कॉलेज के कार्यक्रम के दौरान छात्रा की मौत का मामला, दोनों ही मामलों में डीजे को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। इसी तरह राजस्थान के झालरापाटन में धार्मिक जुलूस के दौरान तेज डीजे के कंपन से मकान की छत की पट्टियां खिसकने और झालावाड़ में पूर्व पार्षद व किशोरी की तबीयत बिगड़ने से डीजे को लेकर लोगों में डर पैदा हो रहा है। इस बीच बद्रीनाथ धाम में 19 और 20 सितंबर को हुए 'देवभूमि कल्चरल फेस्टिवल-2026' में तेज संगीत और डीजे के इस्तेमाल का मामला सामने आने के बाद इस तरह के कार्यक्रमों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
तेज संगीत और डीजे का शोर :
त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, शादियां रिश्तों को जोड़ने के लिए और धार्मिक-सामाजिक आयोजन लोगों को एक-दूसरे के करीब लाने के लिए। जब इन आयोजनों में तेज संगीत और डीजे का शोर इतना बढ़ जाए कि आसपास रहने वाले लोगों के लिए सांस लेना, पढ़ना, सोना या सामान्य बातचीत करना मुश्किल हो जाए, तब सवाल केवल पसंद और मनोरंजन का नहीं रह जाता। यह सार्वजनिक स्वास्थ्य और सामाजिक जिम्मेदारी का विषय भी बन जाता है। आम तौर पर ध्वनि प्रदूषण की चर्चा सुनने की क्षमता पर पड़ने वाले असर के संदर्भ में होती है, लेकिन अत्यधिक शोर का प्रभाव इससे कहीं व्यापक हो सकता है। डॉक्टरों का मानना है कि अचानक बहुत तेज आवाज से शरीर में तनाव से जुड़े हार्मोन बढ़ सकते हैं और रक्तचाप में अस्थायी वृद्धि हो सकती है। कुछ लोगों को तेज शोर के दौरान घबराहट, सिरदर्द, बेचैनी, धड़कन तेज होने जैसी शिकायतें हो सकती हैं। जिन लोगों को पहले से हृदय संबंधी बीमारी या उच्च रक्तचाप जैसी समस्या है, उनके लिए अत्यधिक शोर खतरनाक साबित हो सकता है। इसलिए इसे महज थोड़ी देर का शोर मानकर नजरअंदाज करना भी उचित नहीं है। यहां एक और बात महत्वपूर्ण है कि शोर की तीव्रता के साथ-साथ यह भी मायने रखता है कि कोई व्यक्ति कितनी देर तक उसके संपर्क में रहता है। तेज आवाज के बिल्कुल पास खड़े रहना और लंबे समय तक लगातार उसी वातावरण में रहना शरीर के लिए अधिक परेशानी पैदा कर सकता है।
संवेदनशील मामला है :
डीजे के अत्यधिक शोर से हर व्यक्ति समान रूप से प्रभावित नहीं होता। छोटे बच्चे अपनी संवेदनशीलता के कारण अधिक परेशान हो सकते हैं। स्कूल के आसपास तेज डीजे बजाने वाले जुलूस निकलने पर पढ़ाई और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। छोटे बच्चों में अचानक तेज आवाज डर और घबराहट पैदा कर सकती है। बुजुर्गों के लिए भी अत्यधिक शोर परेशानी का कारण बन सकता है। बीमार लोगों के लिए शांत वातावरण उपचार का महत्वपूर्ण हिस्सा होता है। अस्पतालों, क्लीनिकों या उनके आसपास तेज डीजे बजाना और भी संवेदनशील मामला है। जिस व्यक्ति को आराम और शांति की जरूरत है, उसके आसपास लगातार तेज आवाज उसके तनाव को बढ़ा सकती है। गर्भवती महिलाओं को भी अनावश्यक और अत्यधिक शोर से बचाना चाहिए। इसलिए आवासीय क्षेत्रों में लंबे समय तक तेज डीजे चलाने को केवल आयोजक की निजी पसंद नहीं माना जा सकता। यहां संतुलन की जरूरत है। धार्मिक या सामाजिक आयोजन करना नागरिकों की सामाजिक और सांस्कृतिक जिंदगी का हिस्सा है। संगीत को भी उसका हिस्सा मान सकते हैं, लेकिन ऐसे आयोजनों के साथ जिम्मेदारियां भी जुड़ी होती हैं।
नियम और मानक मौजूद हैं :
ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए देश में नियम और मानक मौजूद हैं। समस्या अक्सर नियमों के प्रभावी पालन की होती है। धार्मिक जुलूस हो या शादी समारोह, आयोजकों को पहले से यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ध्वनि निर्धारित सीमा में रहे और प्रतिबंधित समय में डीजे जैसी चीजों का इस्तेमाल न हो। प्रशासन के लिए भी केवल शिकायत मिलने का इंतजार करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए। त्योहारों, जुलूसों और शादी समारोहों के दौरान निगरानी पर ध्यान दिया जाए। पुलिस और स्थानीय प्रशासन को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नियम सभी आयोजनों पर समान रूप से लागू हों। डीजे संचालकों की भी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। उन्हें यह पता होना चाहिए कि स्पीकर की क्षमता का मतलब यह नहीं कि उसे हर आयोजन में अधिकतम आवाज पर चलाया जाए। आयोजक और डीजे संचालक दोनों को ध्वनि की निर्धारित सीमा और समय का पालन करना चाहिए। आयोजनों में डीजे का इस्तेमाल पर्यावरण पर ही नहीं धार्मिक आस्था पर भी चोट कर रहा है।
-ज्ञान चंद पाटनी
यह लेखक के अपने विचार हैं।

Comment List