सौर ऊर्जा संचालित भारत का पहला जिला

भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरण दृष्टिकोण और स्थानीय शासन की क्षमता का प्रतीक 

सौर ऊर्जा संचालित भारत का पहला जिला

हाल ही में भारत के छोटे से द्वीपीय जिले दीव ने दिन में अपनी बिजली की पूरी जरूरत सौर ऊर्जा से पूरी करके ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है।

हाल ही में भारत के छोटे से द्वीपीय जिले दीव ने दिन में अपनी बिजली की पूरी जरूरत सौर ऊर्जा से पूरी करके ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल की है। यह उपलब्धि न केवल तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह भारत की ऊर्जा नीति, पर्यावरण दृष्टिकोण और स्थानीय शासन की क्षमता का भी प्रतीक है। ऐसे समय में जब जीवाश्म ईंधन पर निर्भरताए ऊर्जा असमानता और जलवायु परिवर्तन के खतरों को लेकर दुनिया भर में चिंताएं जताई जा रही हैं, सीमित संसाधनों वाले दीव जैसे जिले का यह कदम एक बड़ी और आशाजनक प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए। पहले दीव अपनी बिजली की जरूरतों का 73 प्रतिशत से अधिक हिस्सा गुजरात से आयात करता था, जिससे बिजली महंगी होती थी और आपूर्ति में अनिश्चितता रहती थी। अब 11.88 मेगावाट की स्थापित सौर क्षमता के साथ दीव दिन में 100प्रतिशत स्थानीय सौर ऊर्जा पर निर्भर है। इसमें से 9 मेगावाट फुदम क्षेत्र में जमीन पर स्थापित सौर पार्क है और शेष 2.88 मेगावाट क्षमता के सौर पैनल 79 सरकारी भवनों की छतों पर लगाए गए हैं। इस बुनियादी ढांचे के माध्यम से दीव ने दिन के समय अपनी सभी घरेलू, वाणिज्यिक और सरकारी बिजली खपत को पूरी तरह से स्थानीय सौर ऊर्जा के माध्यम से पूरा करना शुरू कर दिया है। इस बदलाव का सबसे सीधा असर स्थानीय उपभोक्ताओं पर पड़ा है।

बिजली की दरों में करीब 12 फीसदी की कमी आई है। पहले जहां 0 से 50 यूनिट तक बिजली 1.20 रुपए प्रति यूनिट मिलती थी, वहीं अब 1 से 100 यूनिट तक की दर 1.01 रुपए प्रति यूनिट तय की गई है। ये सस्ती दरें सिर्फ सब्सिडी का नतीजा नहीं हैं, बल्कि यह एक कुशल ऊर्जा संरचना का नतीजा है जिसमें सौर ऊर्जा उत्पादन, ग्रिड वितरण और नीतिगत समर्थन के बीच संतुलन है। साथ ही हर साल करीब 13000 टन कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन में कमी आ रही है, जो पर्यावरण के लिहाज से एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। सौर ऊर्जा पर सबसे बड़ी आपत्ति इसकी सीमित समय अवधि है। इसे सिर्फ दिन में ही बनाया जाता है और इसकी भूमिका रात के समय की जरूरतों तक ही सीमित है। दीव ने इस चुनौती का समाधान इस तरह किया कि सौर ऊर्जा उत्पादन को दिन के समय की पीक डिमांड के साथ जोड़ दिया गया और बाकी समय के लिए पारंपरिक ग्रिड सपोर्ट को रखा गया। इसका मतलब यह है कि दीव पूरी तरह से ग्रिड से कटा हुआ नहीं है, बल्कि अपनी जरूरतों का एक बड़ा और निर्णायक हिस्सा टिकाऊ और नवीकरणीय स्रोतों से जोड़ चुका है।

यह मॉडल एक हाइब्रिड सिस्टम की ओर इशारा करता है, जो भारत जैसे विविधतापूर्ण जलवायु और सामाजिक संरचना वाले देश के लिए एक व्यावहारिक तरीका है। 2024 के अंतरिम बजट में घोषित और फरवरी में औपचारिक रूप से शुरू की गई केंद्र सरकार की पीएम-सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना दीव के इस प्रयास में एक महत्वपूर्ण आधार रही। इस योजना के तहत 3 किलोवाट तक के रूफटॉप सोलर पैनल लगाने पर केंद्र सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जाती है। इसके अलावा बैंकों से बिना जमानत के लोन की सुविधा और ब्याज दर रेपो रेट से केवल 0.5प्रतिशत अधिक रखने की नीति ने इसे व्यवहार्य और जनोन्मुखी बना दिया है। यह ऊर्जा का लोकतंत्रीकरण है, जिसमें उपभोक्ता अब उत्पादक की भूमिका भी निभाता है। दीव का यह मॉडल हमें ऊर्जा नीति से जुड़े कई बुनियादी सवालों से जोड़ता है। भारत के बाकी जिले, खासकर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र दीव की राह पर चल सकते हैं, लेकिन कुछ शर्तों के साथ।

पहली जरूरत है स्थानीय परिस्थितियों के हिसाब से अनुकूल योजना बनाना। हर क्षेत्र में खुली जमीन, साफ धूप या प्रशासनिक एकजुटता नहीं है जो दीव में है। सौर ऊर्जा उत्पादन में एक बड़ी बाधा भूमि की उपलब्धता और सामाजिक स्वीकृति है। जमीन पर लगाए जाने वाले संयंत्रों के लिए बहुत ज्यादा जगह की जरूरत होती है, जिससे कृषि या पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील क्षेत्रों में संघर्ष हो सकता है। यही कारण है कि छत पर सौर ऊर्जा का महत्व लगातार बढ़ रहा है, लेकिन इसके लिए धन, तकनीकी सहायता और जागरूकता की भी जरूरत है। इस संदर्भ में दीव की एक और उपलब्धि उल्लेखनीय है सरकारी भवनों की छतों का उपयोग। यह मॉडल नगर पालिकाओं, पंचायतों और विकास प्राधिकरणों को सशक्त बनाने का अवसर प्रदान करता है।

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जब राज्य के संसाधनों का उपयोग जनहित में किया जाता है और ऊर्जा जैसी बुनियादी सेवा को स्वच्छ, किफायती और टिकाऊ रूप में प्रस्तुत किया जाता है, तो विकास का एक नया आदर्श स्थापित होता है। यह ऊर्जा न्याय की दिशा में एक मजबूत कदम है। भारत ने 2070 तक नेट जीरो का लक्ष्य रखा है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने में अक्षय ऊर्जा का बड़ा योगदान अपेक्षित है। दीव का उदाहरण इस दिशा में एक ठोस और सफल प्रयोग है।

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-देवेन्द्रराज सुथार
यह लेखक के अपने विचार हैं।

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