1500 करोड़ के जमीन घोटाले में बड़ा खुलासा, सरकारी लीज भूमि बनी निजी खातेदारी
लोकायुक्त ने तत्कालीन कलक्टर की भूमिका को माना संदिग्ध
भीलवाड़ा। शहर के चित्तौड़ रोड स्थित 1500 करोड़ से अधिक की बेशकीमती सरकारी औद्योगिक भूमि के भू-उपयोग परिवर्तन (रिवर्ट बेक) और नियम विरुद्ध हस्तांतरण को लेकर सनसनीखेज मामला सामने आया है। आरटीआई से प्राप्त दस्तावेजों और प्रशासनिक अभिलेखों के आधार पर चित्तौड़गढ़ निवासी शिकायतकर्ता संजय माथुर ने भीलवाड़ा जिला प्रशासन को पत्र सौंपकर पूरे मामले की जांच की मांग की है। आरोप है कि सरकारी अधिकारियों और भू-माफियां की सांठगांठ से राज्य सरकार को लगभग 2000 करोड़ रुपए के राजकोषीय नुकसान का सामना करना पड़ा है। इस पूरे फर्जीवाड़े पर राजस्थान लोकायुक्त ने भी गंभीर सवाल उठाए हैं और जांच में तत्कालीनकलेक्टर की भूमिका का संदिग्ध माना है। चित्तौड़ रोड पर स्थित 51 बीघा की यह प्राइम लैंड करोड़ों रुपए की संपत्ति है।
एक ओर जहां प्रशासनिक आदेशों के तहत इसे री-बैक की प्रक्रिया में डाला गया, वहीं दूसरी ओर जांच समिति की रिपोर्ट ने साफ कर दिया कि बिना खातेदारी अधिकार के औद्योगिक भूमि को निजी पक्ष के नाम कृषि दर्ज कराने की साजिश रची गई थी। विधानसभा और लोकायुक्त के दखल के बाद अब इस पूरे प्रकरण में राजस्व रिकॉर्ड और विभागीय कार्यप्रणाली पर गाज गिरना तय माना जा रहा है। गौरतलब है कि शहर के पॉश चित्तौड़ रोड स्थित करोड़ों रुपये की 51-15 बीघा (51 बीघा 15 बिस्वा) औद्योगिक लीज भूमि को री-बैक कर पुन: कृषि दर्ज करने के इस मामले में एक तरफ जहांं जिला प्रशासन ने राजस्व नियमों का हवाला देते इसे कृषि भूमि में दर्ज करने की स्वीकृति दी थी, वहीं उच्च स्तरीय जांच समिति ने इस पूरे खेल का पर्दाफाश कर कंपनी के पास वैध स्वामित्व ही न होने की बात उजागर की है।
यूं चला गड़बड़झाला का खेल
वर्ष 1966 में राज्य सरकार की ओर से औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने के लिए चित्तौड़ रोड स्थित यह राजकीय स्वामित्व की भूमि राजस्थान वनस्पति कंपनी को 99 साल की सशर्त लीज पर आवंटित की गई थी। वर्ष 1996 में ही कंपनी के सिक यूनिट घोषित होने पर बीआईएफआर द्वारा रिवाइवल प्लान स्वीकार किया गया, जिसमें केवल लीज होल्ड अधिकारों का हस्तांतरण होना था। लेकिन वर्ष 2006 में अधिकारियों की मिलीभगत से वनस्पति कंपनी और कैप्रिकॉर्न कंपनी के बीच भूमि का विक्रय पत्र निष्पादित कर पंजीयन कराया गया। वर्ष 2011 में राज्य सरकार ने आदेश जारी कर स्पष्ट किया कि कैप्रिकॉर्न कंपनी केवल बचे हुए वर्षों के लिए औद्योगिक प्रयोजन के लिए लीज अधिकार रखेगी। इस पर किसी भी प्रकार का व्यावसायिक/आवासीय निर्माण प्रतिबंधित रहेगा। वर्ष 2013-14 में कैप्रिकॉर्न कंपनी ने महज 3 महीने ऑयल मिल चलाकर कलक्टर के समक्ष भूमि को स्वयं की खातेदारी मान कृषि में रिवर्ट बेक करने का प्रार्थना पत्र पेश कर दिया।

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