आदिवासियोंं पर सरकार तो चला रही अभियान, विवि में विमर्श पर व्यवधान; विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर नहीं मिला हॉल
व्याख्यान में खड़ी हुईं प्रशासनिक बाधाएं
जयपुर। एक ओर राज्य और केंद्र सरकारें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और आदिवासी समुदायों के संवैधानिक अधिकारों, सम्मान और संरक्षण को लेकर विभिन्न अभियान चला रही हैं, वहीं दूसरी ओर राजस्थान के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित राजस्थान विश्वविद्यालय में विश्व आदिवासी दिवस की पूर्व संध्या पर आदिवासी विमर्श से जुड़े एक अकादमिक आयोजन को कई बाधाओं का सामना करना पड़ा। ह्यआदिवासी : पहचान मूल निवासी की विषय पर आयोजित लेक्चर सीरीज के आयोजकों का आरोप है कि पहले विश्वविद्यालय का एमएमटीटीसी हॉल उपलब्ध नहीं कराया गया और बाद में देराश्री शिक्षक सदन में कार्यक्रम शुरू हुआ तो वहां बिजली बाधित हो गई। आयोजन के दौरान पुलिस के पहुँचकर पूछताछ करने और कार्यक्रम शीघ्र समाप्त करने के लिए कहे जाने का मामला भी सामने आया है।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बुनियादी सवाल खड़ा किया है कि यदि विश्वविद्यालय परिसर भी आदिवासी समाज की पहचान, इतिहास, अधिकार और सामाजिक स्थिति पर निर्भीक अकादमिक संवाद के लिए जगह उपलब्ध नहीं कराएंगे, तो ऐसी खुली बहस आखिर होगी कहाँ? विश्वविद्यालयों का मूल चरित्र ही विचारों, असहमतियों और सामाजिक प्रश्नों को विमर्श की मेज तक लाना है। कार्यक्रम संयोजक डॉ. जीएल मीणा के अनुसार उन्होंने 5 अगस्त को एमएमटीटीसी हॉल के लिए विश्वविद्यालय प्रशासन को पत्र दिया था। इसके बाद कार्यक्रम की सूचना सार्वजनिक की गई। मुख्य वक्ता के रूप में मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता अरुणा रॉय और पूर्व आईपीएस अधिकारी एवं साहित्यकार हरिराम मीणा को आमंत्रित किया गया था।
हॉल बदला, आदिवासी आयोजकों से पुलिस ने की पूछताछ
आयोजकों का कहना है कि कुलगुरु सचिवालय से उन्हें बताया गया कि एमएमटीटीसी हॉल उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। इसके बाद कार्यक्रम देराश्री शिक्षक सदन में रखा गया, लेकिन आयोजन के दौरान बिजली बाधित हो गई। इसी बीच पुलिस भी पहुँची और आयोजकों से कार्यक्रम के संबंध में पूछताछ की। आयोजकों के अनुसार सदन प्रबंधन की ओर से भी कार्यक्रम जल्द समाप्त करने का आग्रह किया जाता रहा, जिससे आयोजन अपेक्षा से पहले समेटना पड़ा।
अरुणा रॉय ने आदिवासी समुदायों के साथ अपने काम के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रकृति के संरक्षण में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और अब समाज की जिम्मेदारी है कि प्रकृति के साथ उनके जीवन और अधिकारों की भी रक्षा करे। हरिराम मीणा ने आदिवासी जीवन-दृष्टि को मैं के बजाय हम पर आधारित बताते हुए उसके समतामूलक चरित्र को रेखांकित किया। उन्होंने जनजातीय समुदायों की सही गणना की आवश्यकता पर भी बल दिया।
हरिराम मीणा ने घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय विचारों के केंद्र होते हैं और आदिवासी जीवन तथा विचारों पर विमर्श में बाधाएँ चिंता पैदा करती हैं। डॉ. जीएल मीणा ने कहा कि आयोजन का उद्देश्य आदिवासी विमर्श को अकादमिक दृष्टि प्रदान करना था और हॉल के लिए विधिवत अनुमति मांगी गई थी।
आयोजकों का कहना है कि कुलगुरु सचिवालय से उन्हें बताया गया कि एमएमटीटीसी हॉल उपलब्ध नहीं कराया जाएगा। इसके बाद कार्यक्रम देराश्री शिक्षक सदन में रखा गया, लेकिन आयोजन के दौरान बिजली बाधित हो गई। इसी बीच पुलिस भी पहुँची और आयोजकों से कार्यक्रम के संबंध में पूछताछ की। आयोजकों के अनुसार सदन प्रबंधन की ओर से भी कार्यक्रम जल्द समाप्त करने का आग्रह किया जाता रहा, जिससे आयोजन अपेक्षा से पहले समेटना पड़ा।
अरुणा रॉय ने आदिवासी समुदायों के साथ अपने काम के अनुभव साझा करते हुए कहा कि प्रकृति के संरक्षण में आदिवासियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है और अब समाज की जिम्मेदारी है कि प्रकृति के साथ उनके जीवन और अधिकारों की भी रक्षा करे। हरिराम मीणा ने आदिवासी जीवन-दृष्टि को मैं के बजाय हम पर आधारित बताते हुए उसके समतामूलक चरित्र को रेखांकित किया। उन्होंने जनजातीय समुदायों की सही गणना की आवश्यकता पर भी बल दिया।
हरिराम मीणा ने घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताते हुए कहा कि विश्वविद्यालय विचारों के केंद्र होते हैं और आदिवासी जीवन तथा विचारों पर विमर्श में बाधाएँ चिंता पैदा करती हैं। डॉ. जीएल मीणा ने कहा कि आयोजन का उद्देश्य आदिवासी विमर्श को अकादमिक दृष्टि प्रदान करना था और हॉल के लिए विधिवत अनुमति मांगी गई थी।

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