विश्व थैलेसीमिया दिवस आज: प्रदेश में थैलेसीमिया के तीन हजार से ज्यादा रोगी, नहीं मिलती सरकार से मदद

थैलेसीमिया ने रोका, चुनौती का सामना कर बदला जीवन

विश्व थैलेसीमिया दिवस आज: प्रदेश में थैलेसीमिया के तीन हजार से ज्यादा रोगी, नहीं मिलती सरकार से मदद
शहर में कई ऐसे युवा हैं जो थैलेसीमिया के शिकार होने के बावजूद अपने मनोबल को मजबूत बनाकर कामयाबी हासिल कर रहे हैं।

जयपुर। थैलेसीमिया के प्रदेश में तीन हजार से ज्यादा रोगी हैं। थैलेसीमिया में रोगी को खून की कमी होने लगती है औार एक निश्चित अवधि के बाद उसे खून चढ़ाना होता है। थैलेसीमिया पीड़ित लोगों को बीमारी के साथ-साथ दोस्त, सहयोगी और समाज द्वारा नकारे जाने जैसी परेशानियों से भी दो चार होना पड़ता है। इन्हें सरकार से किसी तरह की मदद नहीं मिलती। इन सब के बावजूद थैलेसीमिया पीड़ित लोग इन चुनौतियों का सामना करते हुए सकारात्मक और सामान्य जीवन जी रहे हैं। शहर में कई ऐसे युवा हैं जो थैलेसीमिया के शिकार होने के बावजूद अपने मनोबल को मजबूत बनाकर कामयाबी हासिल कर रहे हैं।

थैलेसीमिया के लक्षण
थैलेसीमिया होने पर सर्दी-जुकाम बना रहता है, शरीर बीमार सा लगता है। सांस लेने में तकलीफ महसूस होना, शरीर में कमजोरी और दर्द बना रहना, दांतों का बाहर की ओर निकलना, उम्र के अनुसार शारीरिक विकास न होना, शरीर का पीला पड़ना, उदासी बने रहना। यह सभी थैलेसीमिया के ही लक्षण हैं।

जर्नलिस्ट बनना चाहती है मितुल
वैशाली नगर में रहने वाली 21 वर्षीय मितुल टांक बीएससी सैकेंड ईयर में पढ़ती हैं। वह पैरामेडिकल की पढ़ाई भी कर रही हैं। वह थैलेसीमिया चिल्ड्रेन सोसायटी से साढ़े चार साल से जुड़ी हुई हैं। मितुल ने थैलेसीमिया को कभी अपने रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया। वह कला के जरिए खुद को अभिव्यक्त करती हैं। उनके पिता बताते हैं कि मितुल ने कुछ शॉर्ट फिल्मों में काम किया है और इंडियाज बेस्ट ड्रामेबाज के टॉप 16 में भी पहुंची है। वह कविताएं भी लिखती हैं जो अखबारों में प्रकाशित होती रहती है। सोसायटी के कार्यक्रमों में वह अक्सर हिस्सा लेती हैं और खुद को बेहतर करने की कोशिश में रहती है। वह जर्नलिस्ट बनना चाहती है।

खुद का ख्याल रखने में सक्षम हूं: अनीता
इंद्रपुरी कॉलोनी में रहने वाली 21 साल की अनिता बासवानी सात वर्ष से थैलेसीमिया चिल्ड्रेन सोसायटी से जुड़ी हुई हैं। उन्होंने 12वीं तक पढ़ाई की है। पिता किराना की दुकान पर काम करते हैं। अनिता कहती हैं कि वह खुद का ख्याल रखने में सक्षम हैं। उन्हें हर 15वें दिन खून चढ़ता है और वह अकेले ही अस्पताल आती हैं। चार महीने पहले उन्होंने अपने पसंद के लड़के से शादी भी की। अनिता बताती है कि जब वह नवी कक्षा में थी, तब उनकी सहपाठी ने एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में उनके साथ डांस करने से मना कर दिया था, लेकिन थैलेसीमिया को उन्होंने कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दी। आज वह सोसायटी के डांस प्रोग्राम्स में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेती हैं।

हमेशा सकारात्मक बदलाव दिखा
पंद्रह वर्षीय भाविका आसवानी न्यू इन्द्रपुरी कॉलोनी में रहती हैं। वह दसवीं कक्षा में है और 8 मई को अंतरराष्टÑीय थैलेसीमिया दिवस पर होने वाले डांस प्रोग्राम में हिस्सा ले रही हैं। मां भूमिका बताती हैं कि भाविका 4 महीने की ही थी जब पता चला कि उसे थैलेसीमिया है। शुरुआत में चिंता हुई और भाविका को दवा से चिड़चिड़ापन भी होता था, लेकिन अब स्कूल में या सोसायटी में दोस्तों और लोगों से घुलने मिलने से उसे एक हौसला मिला है। भूमिका कहती हैं कि उनकी दो बेटियां और एक बेटा है। भाविका उन्हें कभी भी अलग नहीं लगी। उसके अंदर हमेशा सकारात्मक बदलाव देखने को मिला है।

घर की सारी जिम्मेदारियां संभाली
18 साल की मुस्कान खान घाटगेट की रहने वाली है। 4 साल की उम्र में मुस्कान की इस लाइलाज बीमारी के बारे में परिवार को पता चला। 6 साल की उम्र में मुस्कान की मां का देहांत हो गया। जिंदगी के थपेड़ों की वजह से मुस्कान पढ़ने से वंचित रह गई। वह अपने इलाज के लिए अकेले सफर करती है और सोसायटी की सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेने के लिए हमेशा आगे रहती है। घर की सारी जिम्मेदारियां मुस्कान ने संभाली, इन सब के बावजूद वह कभी निराश नहीं रहती। मुस्कान कहती है कि अगर वह पढ़ पाती तो डॉक्टर बनती।

ह मने हमेशा सरकार से यह मांग की है कि थैलेसीमिया को लेकर लोगों को जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। अनजाने में लोग जीवनभर की मुश्किले मोल लेते हैं। लोग शादी से पहले थैलेसीमिया की जांच करा ले। थैलेसीमिया माइनर की शादी थैलेसीमिया माइनर से ना हो इसका ध्यान नहीं रखें तो आने वाले बच्चों में यह बीमारी नहीं होगी। -नरेश भाटिया, अध्यक्ष , थैलेसीमिया चिल्ड्रेन सोसायटी

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