लोकरंग में पहली बार पहुंचे लद्दाख नृत्य शैली पर फिदा हुआ जयपुर, शोंडोल ने लूटी महफिल

गोवा के समई-कोली से लक्षद्वीप के बंडिया तक

लोकरंग में पहली बार पहुंचे लद्दाख नृत्य शैली पर फिदा हुआ जयपुर, शोंडोल ने लूटी महफिल
राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव लोकरंग में पहली बार प्रस्तुति देने पहुंचे लद्दाख के कलाकारों ने रविवार को शाही शोंडोल नृत्य से दर्शकों का दिल जीत लिया। जब महिला कलाकार फिरोजे जड़े भारी पेराक और ऊनी गोंचा में मंच पर उतरीं, तो जेकेके की फिजा ही बदल गई।

जयपुर। राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव लोकरंग में पहली बार प्रस्तुति देने पहुंचे लद्दाख के कलाकारों ने शाही शोंडोल नृत्य से दर्शकों का दिल जीत लिया। जब महिला कलाकार फिरोजे जड़े भारी पेराक और ऊनी गोंचा में मंच पर उतरीं, तो जेकेके की फिजा ही बदल गई। महोत्सव के छठे दिन मध्यवर्ती मंच पर इस नृत्य शैली ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। 11 दिवसीय महोत्सव में देश के अलग-अलग सूबों की तहजीब एक ही छत के नीचे देखने को मिली। लद्दाख का शाही नृत्य कहलाने वाला शोंडोल इस इलाके के प्राचीन शाही दरबारों में जन्मा। यह राजाओं और बड़े ओहदेदारों के लिए प्रस्तुत किया जाता था। इसकी धीमी, लहराती और बेहद नफीस हरकतें हर नजर को बांध लेती हैं। इसे पेश करने वाली महिलाएं पारंपरिक ऊनी गोंचा पहनती हैं और फिरोजे जड़े भारी पेराक (सिर का पारंपरिक आभूषण) से खुद को सजाती हैं।

दीपों की जगमगाहट और समंदर की दुआएं: गोवा का समई नृत्य जगमगाते पारंपरिक दीपों से खास बन गया। शिगमोत्सव और धार्मिक त्योहारों पर होने वाले इस नृत्य में कलाकार पीतल के जलते दीप सिर पर साधकर लयबद्ध अंदाज में थिरकते हैं। घुमट और समेल जैसे साज इसमें सुरीला रंग भरते हैं। शिल्पग्राम में गोवा का कोली नृत्य भी हुआ, जो मछुआरा समुदाय की समुद्री जिंदगी को प्रस्तुत करता है। इसका रिश्ता नारळी पूर्णिमा से है, जो मछली पकड़ने के नए मौसम की शुरुआत मानी जाती है।  

मटकों की रवायत : लक्षद्वीप का बंडिया

लक्षद्वीप के मिनिकॉय द्वीप का बंडिया नृत्य महिलाओं की पुरानी रवायत को जिंदा कर गया, जब वे घरों के लिए सजे मटकों में पानी भरकर लाती थीं। कलाकारों ने मटके थामकर स्थानीय भाषा माहल के लोकगीतों पर लिबू नामक लंबी, चोगे जैसी पोशाक में पेशकश दी।

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शिल्पग्राम में राजस्थानी रंगत :

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शिल्पग्राम में जयपुर के टिकम की कठपुतली और कोटपूतली के महमूद के बहुरूपिया ने खूब वाहवाही बटोरी। मंच पर जयपुर की राखी पूनम का कालबेलिया, डीडवाना के रमेश कुमार का लोक गायन, बारां के अमित का चकरी नृत्य, जयपुर के कन्हैया लाल का लोक गायन व नृत्य, दौसा के जलसिंह का पद गायन, जयपुर की तारा चौहान का घूमर और बांसवाड़ा के खेमराज डिंडोर का गैर झूमरा हुआ। गुजरात का तलवार रास और उत्तर प्रदेश का पाई डंडा भी दर्शकों को ख़ूब भाया।

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