सतरी बाई का जज्बा : 2 दिन का सफर, दुर्गम पहाड़ और फिर लोकतंत्र के नाम वोट!

मतदान के आगे हार गए पहाड़

सतरी बाई का जज्बा : 2 दिन का सफर, दुर्गम पहाड़ और फिर लोकतंत्र के नाम वोट!
माउंट आबू के शेरगांव की सतरी बाई ने वोट डालने के लिए दो दिन तक दुर्गम पहाड़ी और जंगल का सफर तय किया। चलने-देखने में असमर्थ सतरी बाई को परिजन पालकी में बैठाकर करीब 20 किलोमीटर दूर ओरिया मतदान केंद्र ले गए। उनका जज्बा लोकतंत्र की प्रेरक मिसाल बन गया।

जयपुर। उम्र 101 साल, कदमों में साथ देने की ताकत नहीं और आंखों से भी ठीक से दिखाई नहीं देता, लेकिन लोकतंत्र में अपनी भागीदारी निभाने का जज्बा ऐसा कि दुर्गम पहाड़ भी रास्ता नहीं रोक सके। माउंट आबू क्षेत्र के शेरगांव की सतरी बाई ने मतदान के लिए दो दिन तक कठिन पहाड़ी और जंगल के रास्तों का सफर तय किया। परिजन उन्हें पालकी में बैठाकर ओरिया ग्राम पंचायत के मतदान केंद्र तक लेकर पहुंचे, जहां उन्होंने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। सतरी बाई की यह यात्रा क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई। आबूरोड पंचायत समिति के अंतर्गत ओरिया ग्राम पंचायत में शनिवार को सरपंच और वार्डपंच पदों के लिए मतदान केंद्र तक पहुंचने के लिए करीब 20 किलोमीटर की पैदल यात्रा करनी पड़ी। ग्रामीण पहले पैदल चलकर गुरु शिखर पहुंचे और फिर वहां से वाहन के जरिए ओरिया मतदान केंद्र पहुंचे।

परिजनों ने पालकी में बैठाकर पार कराया पहाड़

शेरगांव निवासी 101 वर्षीय सतरी बाई पत्नी छतर सिंह ठीक से चलने और देखने में असमर्थ हैं। इसके बावजूद उन्होंने मतदान करने की इच्छा जताई। उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए परिजनों ने उन्हें पालकी में बैठाकर मतदान केंद्र तक पहुंचाने का फैसला किया। उनके पड़पौत्र देवी सिंह ने इस पूरी यात्रा की व्यवस्था की और परिवार के सदस्यों ने मिलकर उन्हें दुर्गम वन मार्ग से बाहर निकाला।

शुक्रवार को शुरू हुआ सफर शनिवार को किया मतदान

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सतरी बाई को शुक्रवार को पालकी में बैठाकर घने जंगल और कठिन पहाड़ी रास्तों से होते हुए उतरज गांव ले जाया गया। वहां रात बिताने के बाद शनिवार सुबह यात्रा दोबारा शुरू हुई। परिजन उन्हें पालकी में लेकर गुरु शिखर पहुंचे। यहां से वाहन के जरिए ओरिया ग्राम पंचायत के मतदान केंद्र तक लाया गया, जहां सतरी बाई ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया।

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रविवार को लौटेंगी अपने गांव

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मतदान के बाद परिजन सतरी बाई के साथ रात ओरिया में ही रुकेंगे। इसके बाद रविवार सुबह शेरगांव लौटने की तैयारी है। 101 साल की उम्र में दो दिन का कठिन सफर तय कर मतदान केंद्र पहुंचीं सतरी बाई की यह यात्रा बताती है कि मतदान का अधिकार उनके लिए कितना मायने रखता है। दुर्गम पहाड़ों के बीच बसे गांव से मतदान केंद्र तक पहुंचने की उनकी कोशिश लोकतंत्र में भागीदारी की एक प्रेरक मिसाल बन गई।

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