कचरे के ढेर में रहने वाले बच्चों को देखकर बदल गई जिंदगी की दिशा
स्कूल के दिनों में जगा सेवा का संकल्प, आज जरूरतमंदों के लिए उम्मीद के पंख बनीं रितु राठौर
कोटा। किसी की जिंदगी में बदलाव लाने के लिए बड़े पद या दौलत की नहीं, बल्कि संवेदनशील दिल और मजबूत इरादों की जरूरत होती है। जब समाज के कई लोग जरूरतमंदों की परेशानियों को देखकर आगे बढ़ जाते हैं, तब कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो उन परेशानियों को अपनी जिम्मेदारी समझ लेते हैं। पंख हौसलों की उड़ान फाउंडेशन की अध्यक्ष रितु राठौर ऐसी ही एक शख्सियत हैं, जिन्होंने करीब 20 साल पहले स्कूल के दिनों में समाजसेवा का जो सपना देखा था, उसे आज अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया है। कभी दशहरा मैदान में कचरे के ढेर के बीच जीवन गुजारते परिवारों के बच्चों को शिक्षा से जोड़ने की चिंता उनके मन में जागी थी। आज उसी सोच ने एक संस्था का रूप ले लिया है, जिसके माध्यम से 70 से 80 सदस्य शहर में समाजसेवा के कार्यों से जुड़े हुए हैं।
दशहरा मैदान का वह दृश्य, जिसने मन को झकझोर दिया
रितु राठौर बताती हैं कि करीब 20 साल पहले, जब वे स्कूल में पढ़ती थीं, तब उनके जीवन में एक ऐसा अनुभव आया, जिसने उनकी सोच और भविष्य की दिशा बदल दी। स्कूल की ओर से उन्हें सर्वे के लिए दशहरा मैदान भेजा गया था। वहां पहुंचकर उन्होंने जो दृश्य देखा, वह उनके मन में गहरी छाप छोड़ गया। मैदान में कचरे के ढेर के बीच कुछ परिवार रह रहे थे। उनके बच्चे सामान्य बच्चों की तरह स्कूल नहीं जा रहे थे और शिक्षा से वंचित थे। जहां दूसरे बच्चों के हाथों में किताबें और कॉपियां होनी चाहिए थीं, वहां इन बच्चों के सामने जीवन की बुनियादी जरूरतें पूरी करने की चुनौती थी। उनके लिए बचपन का मतलब पढ़ाई, खेल और सपनों को पूरा करना नहीं, बल्कि परिवार के साथ मुश्किल परिस्थितियों में जीवन गुजारना बन गया था। रितु के मन में सवाल उठा कि आखिर इन बच्चों का भविष्य क्या होगा? क्या परिस्थितियां ही तय करेंगी कि ये बच्चे आगे चलकर क्या बनेंगे? क्या इन्हें भी शिक्षा और बेहतर जीवन का अवसर नहीं मिलना चाहिए? इन सवालों ने उनके भीतर कुछ करने की इच्छा पैदा कर दी।
माता-पिता से मिली सेवा की सीख
रितु राठौर मानती हैं कि समाजसेवा की प्रेरणा उन्हें अपने माता-पिता और परिवार से मिली। बचपन में उन्होंने अपने घर में देखा कि कोई भी व्यक्ति मदद की उम्मीद लेकर आता था, तो उनके माता-पिता ने उसे निराश करने के बजाय यथासंभव सहायता करने की कोशिश की। उन्होंने अपने परिवार से सीखा कि किसी की मदद करने के लिए यह देखना जरूरी नहीं कि वह कौन है, कहां से आया है या उसके पास क्या है। जरूरत के समय किसी के काम आना ही इंसानियत का सबसे बड़ा परिचय है। बचपन में देखे गए ये छोटे-छोटे अनुभव उनके मन पर गहरा असर छोड़ते गए। उन्होंने महसूस किया कि दूसरों की मदद करने से न केवल किसी की परेशानी कम होती है, बल्कि समाज में विश्वास, अपनापन और सहयोग की भावना भी मजबूत होती है।

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