सांगोद अस्पताल में प्रसव कराने के बजाय कोटा भेजी प्रसूता : हाई रिस्क बताकर किया रेफर, 25 मिनट बाद चलती एम्बुलेंस में हो गई सामान्य डिलीवरी
बीपी 160/110 बताकर लगाया था लेबेटालोल इंजेक्शन, एएनसी कार्ड में बीपी सामान्य दर्ज होने से उठे सवाल
कोटा। सरकारी अस्पतालों में प्रसव के लिए पहुंचने वाली गर्भवती महिलाओं को बेहतर उपचार और सुरक्षित प्रसव की उम्मीद रहती है, लेकिन सांगोद अस्पताल में सामने आए एक मामले ने चिकित्सा व्यवस्था और रेफर करने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यहां प्रसव के लिए पहुंची एक गर्भवती महिला को हाई रिस्क बताकर कोटा के जेके लोन अस्पताल रेफर कर दिया गया। लेकिन अस्पताल से निकलने के महज 20-25 मिनट बाद ही चलती 108 एम्बुलेंस में महिला का सामान्य प्रसव हो गया। महिला ने करीब 3 किलो 300 ग्राम वजन के स्वस्थ बच्चे को जन्म दिया। अब सवाल यह है कि जब प्रसव इतना नजदीक था तो क्या रेफर करने से पहले प्रसव की स्थिति का सही आकलन किया गया था?
आधे घंटे में रेफर, 23 मिनट बाद पहुंची एम्बुलेंस
महिला के पति परवेज के अनुसार वे पत्नी को लेकर करीब 12 बजे सांगोद अस्पताल पहुंचे थे। वहां जांच के बाद उन्हें बताया गया कि महिला का पानी निकल गया है और बच्चे की स्थिति को देखते हुए जोखिम नहीं लिया जा सकता। करीब 12 से 12.30 बजे के बीच उसे कोटा रेफर कर दिया गया। इसके बाद 12 बजकर 53 मिनट पर एम्बुलेंस अस्पताल पहुंची।
रास्ते में बाहर आने लगा बच्चे का सिर
परवेज ने बताया कि सांगोद से रवाना होने के करीब 20-25 मिनट बाद बालूहेड़ा चौकी के पास एम्बुलेंस में ही बच्चे का सिर और हाथ बाहर आने लगे। स्थिति को देखते हुए एम्बुलेंस स्टाफ ने प्रसव की प्रक्रिया शुरू कराई। करीब डेढ़ बजे महिला ने बच्चे को जन्म दिया। इस दौरान ईएमटी भूपेंद्र गुर्जर ने बालूहेड़ा पीएचसी से संपर्क किया। वहां से डॉ. मिथलेश गुप्ता ने एएनएम हेमलता और सहायिका अनीता शर्मा को एम्बुलेंस में भेजा। प्रसव के बाद नवजात की जांच की गई। बच्चा स्वस्थ मिला और उसका वजन करीब 3.3 किलो बताया गया।
बीपी 160/110 था, नियंत्रित नहीं हुआ तो किया रेफर
सांगोद अस्पताल की स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. रेणु राय ने बताया कि महिला का बीपी 160/110 था। पिछले महीने से ही उसे बीपी की दवा दी जा रही थी। महिला का वजन अधिक था और बच्चे का वजन भी ज्यादा होने की आशंका थी। ऐसे में प्रसव के दौरान जटिलताएं हो सकती थीं। बीपी नियंत्रित करने के लिए लेबेटालोल के दो इंजेक्शन 20-20 मिनट के अंतराल पर लगाए गए, लेकिन बीपी नियंत्रित नहीं हुआ। इसके बाद हाई रिस्क प्रोटोकॉल के तहत जेके लोन अस्पताल रेफर किया गया। उन्हें उम्मीद थी कि महिला सुरक्षित कोटा पहुंच जाएगी।
एम्बुलेंस में ही दिया प्राथमिक उपचार
बालूहेड़ा पीएचसी प्रभारी डॉ. मिथलेश गुप्ता ने बताया कि डिलीवरी के बाद डॉ. रेणु राय से फोन पर बात कर उनके निर्देशानुसार ट्रेनेक्सा इंजेक्शन लगाया गया और ऑक्सीटोसिन की ड्रिप शुरू की गई। प्रसूता और नवजात को प्राथमिक उपचार देने के बाद जेके लोन अस्पताल भेजा गया। फिलहाल दोनों अस्पताल में भर्ती हैं। परिजनों के अनुसार महिला का बीपी सामान्य है और बच्चा भी स्वस्थ है।
एएनसी कार्ड में सामान्य बीपी, फिर हाई रिस्क कैसे?
इस मामले में सबसे अहम सवाल महिला के एएनसी कार्ड में दर्ज बीपी को लेकर है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार कार्ड में बीपी सामान्य दर्ज है और बीपी की परेशानी का उल्लेख नहीं है। वहीं डॉक्टर का कहना है कि पिछले महीने से बीपी की दवा चल रही थी। ऐसे में गर्भावस्था के दौरान बीपी की स्थिति, उपचार और अस्पताल में की गई जांच के रिकॉर्ड का मिलान जरूरी है।
परिजनों ने उठाए सवाल, 181 पर शिकायत
परवेज का कहना है कि तीन साल पहले उनकी पत्नी की हिंगोनिया अस्पताल में सामान्य डिलीवरी हुई थी। उनका आरोप है कि सांगोद में ही प्रसव कराया जा सकता था, लेकिन पत्नी को रेफर कर दिया गया। रास्ते में प्रसव होने से मां और बच्चे की जान जोखिम में पड़ सकती थी। उन्होंने 181 पर शिकायत दर्ज कराने की बात कही है।
जांच के दायरे में चार सवाल
-एएनसी कार्ड में बीपी सामान्य दर्ज होने के बावजूद अस्पताल में 160/110 कैसे मिला?
-बीपी नियंत्रित नहीं होने पर लगाए गए लेबेटालोल इंजेक्शन का कितना असर हुआ?
-प्रसव नजदीक होने की स्थिति का आकलन रेफर करने से पहले किया गया था या नहीं?
-क्या रेफर करने के बजाय सांगोद अस्पताल में सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था संभव थी?
फिलहाल इस पूरे मामले में एएनसी कार्ड, अस्पताल की जांच रिपोर्ट, बीपी की रीडिंग और उपचार के रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि रेफर करने का निर्णय किन चिकित्सकीय परिस्थितियों में लिया गया था।

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