दालों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए म्यांमार, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया बनेंगे सहारा

तुअर दाल मार रही उछाल

दालों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए म्यांमार, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया बनेंगे सहारा
बढ़ती कीमतों को कम करने की कवायद, अफ्रीका सहित अन्य देशों से होगी आपूर्ति।

कोटा। दालों की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार अब बड़े स्तर पर विदेशों से आयात का सहारा लेने जा रही है। महंगाई से जूझ रहे आम उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से केंद्र सरकार ने दालों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए म्यांमार, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और अफ्रीकी देशों से आयात की प्रक्रिया तेज करने का निर्णय लिया है। इसका असर जल्द ही कोटा सहित देशभर के बाजारों में दिखाई देने की उम्मीद है। कोटा की प्रमुख कृषि उपज मंडियों में पिछले कुछ सप्ताह से दालों के भाव में लगातार अस्थिरता बनी हुई है। अरहर यानी तूर दाल के दामों में सबसे ज्यादा तेजी देखी जा रही है, जबकि मूंग और उड़द दाल भी महंगी बनी हुई हैं। थोक बाजार में सीमित आवक और स्टॉकिस्टों की सक्रियता के चलते खुदरा बाजार में दाम और ऊपर चले गए हैं। इसके कारण मध्यम वर्ग और दिहाड़ी मजदूरों की रसोई का बजट बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। वर्तमान में बाजार में दालों के भाव क्वलिटी के हिसाब से 110 से 150 रुपए प्रति किलो के बीच बने हुए हैं।

10 लाख टन दाल खरीदने का निर्णय
पिछले कुछ माह से दालों की कीमतों में लगातार इजाफा हो रहा है। देश में लगातार दालों का उत्पादन कम होने से यह स्थिति उत्पन्न हुई है। ऐसे में आमजन की थाली से दालें गायब होती जा रही थी। अब केंद्र सरकार ने दालों की स्टॉक लिमिट तय कर दी है। साथ ही केंद्र सरकार ने 10 लाख टन दाल इम्पोर्ट करने का निर्णय लिया है। इसके अलावा सरकार ने आयात शुल्क भी हटा दिया है. वहीं, दालों के स्टॉक की निगरानी करने के लिए एक कमेटी बनाई गई है। जानकारी के अनुसार देश में अरहर का उत्पादन घटकर 34.30 लाख टन पर पहुंच गया है, जबिक इसका लक्ष्य 45.50 लाख टन रखा गया था। सरकार ने फसल सीजन में अरहर दाल के उत्पादन में बढ़ोतरी का अनुमान लगाया था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

आयात से ऐसे मिलेगी राहत
सरकारी अधिकारियों के अनुसार दालों के आयात पर पहले से लागू कुछ प्रतिबंधों में ढील दी जा रही है, ताकि अधिक मात्रा में दाल देश में आ सके। आयातित दाल सीधे सरकारी एजेंसियों नैफेड व सहकारी समितियों के माध्यम से बाजार में उतारी जाएगी। इससे न सिर्फ सप्लाई बढ़ेगी, बल्कि कीमतों पर भी नियंत्रण स्थापित किया जा सकेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर आयात समय पर और पर्याप्त मात्रा में होता है तो अगले 1 से 2 महीनों में दालों के खुदरा दामों में 15 से 25 प्रतिशत तक गिरावट संभव है। व्यापारियों के अनुसारए स्थानीय स्तर पर आवक सामान्य से कम हैए जबकि मांग लगातार बनी हुई है। यही कारण है कि कीमतों में नरमी नहीं आ पा रही।

प्रतिकूल मौसम ने घरेलू उत्पादन पर फेरा पानी
कृषि विभाग के सेवानिवृत्त अधिकारी रमेश कुमार के अनुसार भारत के महाराष्टÑ और मध्यप्रदेश में तुअर दाल की खेती खरीफ मौसम में होती है। इसकी फसल के तैयार होने में नौ महीने लगते हैं। बीते खरीफ सीजन में तुअर की बुवाई अच्छी हुई थी, लेकिन बाद के महीनों में मौसम प्रतिकूल होने से अच्छे उत्पादन की संभावनाओं पर पानी फिर गया था। बेमौसमी बारिश से तुअर का उत्पादन 23 फीसदी घटकर 29.5 लाख टन रह गई थी। जबकि बीते सीजन के दौरान देश में कुल अरहर उत्पादन 36.5 लाख टन रहा था। इसके अलावा देश में तुअर का कैरीओवर स्टॉक घटकर पांच साल के न्यूनतम स्तर 3.1 लाख टन पर आ गया था।

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आयात का यह होगा असर
-बाजार में दालों की उपलब्धता बढ़ेगी
-कीमतों में धीरे-धीरे गिरावट आएगी
-जमाखोरी पर लगेगी लगाम
-आम लोगों को मिलेगी राहत

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कीमतों में तेजी होने के कारण अब थाली से दालें गायब होती जा रही है। महंगाई के कारण दालों की सब्जी कम बनने लगी है। पहले हफ्ते में दो बार तुअर दाल की सब्जी बनती थी, लेकिन दाम बढ़ने के कारण हफ्ते में एक ही बार दाल खाते हैं।
-सुगन कंवर, गृहिणी

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तुअर सहित अन्य दालों की कीमतों में पिछले साल की तुलना में बढ़ोतरी हुई है। सबसे ज्यादा प्रभाव दालों का उत्पादन कम होने से पड़ा है। अरहर दाल से विदेशों से आती है। इसकी चावल के साथ ज्यादा खपत होने से भाव तेज बने हुए है।
-नरेश कुमार, थोक किराना व्यापारी

पिछले साल के मुकाबले दालों के घरेलू उत्पादन में 7.90 लाख टन की कमी दर्ज की गई है। अब दालों की बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए सरकार विदेशों से दालों के आयात की मात्रा बढ़ाएगी। इस साल करीब दस लाख टन दाल विदेशों से खरीदी जाएगी।
-बी. रावत, प्रबंधक, नेफेड

 

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