पुतले सही सलामत खड़े होने तक अटकी रहती हैं अधिकारियों की सांसें
तीन से चार माह की होती है तैयारी
कोटा । जिस तरह से एक परिवार में बेटी के ब्याह की तैयारी होती है। उसका ब्याह सही सलामत होने तक पूरे परिवार विशेष रूप से पिता के लिए चिंताजनक बना रहता है। उसी तरह से दशहरा मैदान में विशालकाय शरीर वाले करीब 12 टन वजनी रावण, कुम्भकरण व मेघनाद के पुतले खड़े करना नगर निगम अधिकारियों के लिए भी बेटी के ब्याह से कम नहीं है। जब तक पुतले सही सलामत खड़े नहीं हो जाते तब तक उनकी सांसे अटकी रहती है। इस बार भी ऐसा ही हुआ।
एक परिवार में बेटी जैस-जैसे बड़ी होती है वैसे-वैसे परिवार के लिए उसके ब्याह की चिंता सताने लगती है। पूरा परिवार उसके ब्याह के लिए अच्छा वर व अच्छा ससुराल देखते हैं। ऐसा होने के बाद उसके ब्याह की तैयारी शुरू की जाती है। कई महीने तक तैयारी करने के बाद जब बारात घर पर आती है तो उनके स्वागत में कोई कमी नहीं रह जाए। इसकी चिंता सताती है। बारात आने के बाद फेरे होने और बेटी के सही सलामत विदा होने के बाद एक परिवार व पिता के लिए सुकून का पल होता है। उसके बाद सभी की थकान मिटती है और चैन की नींद आती है।
ठीस उसी तरह का आयोजन होता है नगर निगम की ओर से हर साल दशहरे पर रावण, कुम्भकरण व मेघनाद के पुतले तैयार करवाना। उसके बाद उन्हें बिना किसी बाधा के मैदान में खड़े करवाना। इतना ही नहीं दशहरे के दिन रावण पूरी तरह से बिना किसी व्यवधान के जल जाए उसके बाद ही निगम अधिकारियों को चैन की नींद आती है।
बेटी के ब्याह में भी तीन से चार महीने की तैयारी और लाखों रुपए खर्च होते है़। उसी तरह से रावण के पुतले बनाने के लिए बजट तय करने से लेकर टेंडर करने, कार्यादेश देने व अच्छे कारीगरों के माध्यम से पुतले तैयार करवाने में भी 3 से 4 माह का समय लगता है। साथ ही लाखों रुपए खर्च होते हैं। गत वर्ष जहां रावण के पुतलों का बजट करीेब 44 लाख था। वहीं इस बार यह 31 लाख रहा। साथ ही पिछली बार अपनाई गई नई तकनीक से पुतलों को बिना पेड़ा बांधे क्रेन की सहायता से खड़ा किया गया। पुतले सही खड़े होने के बाद अब उनके सही ढंग से जलने के बाद ही अधिकारियों व इंजीनियरों को राहत की सांस मिलेगी।
आंखों में कटी पूरी रात
एक्सईएन कुरैशी ने बताया कि जिस तरह से बेटी के ब्याह के समय रात भर फेरे व वैवाहिक रस्मे होने के दौरान परिवार के सदस्यों की रात आंखों में कटती है। ठीस उसी तरह से रावण का पुतला खड़ा करने के दौरान हुआ। पहले जहां दिन के समय पुतले खड़े किए जाते थे। लेकिन इस बार रात 12 बजे पुतले खड़े करना शुरू किया जो सुबह 7 बजे तक खड़े हो सके। इस दौरान निगम अधिकारियों के साथ इंजीनियरों की टीम पूरे समय मौके पर मौजूद रही। पूरी रात आंखों में कटी। कुम्भकरण व मेघनाद के पुतले तो सही सलामत खड़े हो गए थे। लेकिन रावण का पुतला खड़ा करते समय वह करीब एक से डेढ़ घंटे तक क्रेन पर हवा में झूलता रहा। इस दौरान हल्का सा झटका लगा और आवाज हुई तो सभी इंजीनियरों की सांसें अटक गई थी। किसी अनहोनी की आशंका से घबराहट होने लगी थी। लेकिन जब पुतला सही ढंग से खड़ा हो गया। उसके बाद राहत की सांस ली। हालांकि इतने बड़े पुतले को खड़ा करते समय उसके सीने पर हल्का सा नुकसान हुआ था। लेकिन उसे बाद में क्रेन की सहायता से ऊपर जाकर कारीगरों ने तुरंत सही कर दिया था। पुतले खड़े होने के बाद सुबह 8 बजे करीब दशहरा मैदान से बाहर निकले।
उन्होंने कहा कि पुतले खड़े करने के दौरान किसी तरह की अनहोनी होने पर वह कुछ लोगों के लिए तमाशा व बुराई करने का मौका हो सकता है। लेकिन वह निगम अधिकारियों के लिए परेशानी का कारण बनता है। किसी भी बड़े काम के दौरान कुछ कमी रहने पर उसकी कमियां निकालना आसान हो सकता है लेकिन उस काम को करना किसी चुनौती से कम नहीं है।
पूर्व की कई घटनाएं दहला देती हैं दिल
नगर निगम में पिछले करीब दो दशक से अधिक समय से रावण के पुतले तैयार करवाने से लेकर उन्हें खड़ा करवाने तक का काम देख रहे अधिशाषी अभियंता ए.क्यू कुरैशी ने बताया कि वे 23 साल से इस काम को करवा रहे हैं। पहले रावण का ऊपरी हिस्सा मिट्टी का बनता था। उसके बाद इसका कद बढ़ाकर 70 फीट किया गया था। बाद में समय-समय पर रावण का कद बढ़ता गया।
कभी 72 तो कभी 80 फीट। कभी 125 तो गत वर्ष 225 फीट तक का विशालकाय रावण का पुतला तक बनाया गया। इस बार भी इसकी लम्बाई 105 ïफीट की है।
कुरैशी ने बताया कि पूर्व में कई बार रावण का पुतला खड़ा करते समय ऐसी घटनाएं हो चुकी हैं जिनसे दिल दहलने लगता है। हालांकि इतना बड़ा काम होने के दौरान छोटी-छोटी समस्याएं आना स्वाभाविक भी है लेकिन उनसे हर बार सीख लेते हुए सुधार के प्रयास भी किए जा रहे हैं।
दो बार आधा जला रावण, कभी गिर भी पड़ा:
निगम इंजीनियरों ने बताया कि रावण के पुतलों को खड़ा करना चुनौतीपूर्ण काम है। तत्कालीन महापौर महेश विजय के समय में जब 125 वें दशहरे के असर पर 125 फीट का रावण बनाया गया था। उस समय वह पूरा जलने से पहले ही पीछे विजयश्री रंगमंच की दीवार पर गिर गया था। जिससे उसका कुछ हिस्सा बिना जले रह गया था। बाद में ुसे पूरा जलाया गया था। गनीमत रही थी कि उस समय कोई अनहोनी नहीं हुई थी।
एक बार मेघनाद का पुतला खड़ा करते समय वह गिर गया था। जिससे उसमें काफी नुकसान हुआ था। लेकिन वह दशहरे से एक दिन पहले का समय था। ऐसे में उसे रातो-रात अधिकारियों की मौजूदगी में कारीगरों से सही कर दिया था। दो साल पहले भी रावण का पुतला खड़ा करते समय क्रेन का पट्टा टूटने से रावण का धड़ गिर गया था। गनीमत रही कि उस समय पेड़ा बंधा हुआ था। जिससे वह अधिक नीचे नहीं गिर सका था। लेकिन उस समय भी पुतले को नुकसान तो हुआ ही था। हालांकि वह घटना भी एक दिन पहले होने से कारीगरों ने उसे सही कर दिया था। यह घटना निगम अधिकारियों व इंजीनियरों के लिए दिल दहला देने वाली थी।
इतना ही नहीं गत वर्ष 225 फीट का विशालकाय रावण का पुतला नई तकनीक से खड़ा तो कर दिया गया था। दो दिन पहले खड़ा होने के दौरान दशहरे से एक दिन पहले मूसलाधार बारिश हो गई। जिससे पुतला भीग गया था। अगले दिन दशहरे पर रावण का पुतला पूरा नहीं जल सका तो यह लोगों के लिए तो हंसी मजाक व बातें बनाने का मौका मिल गया। जबकि निगम इंजीनियरों व अधिकारियों के लिए मेहनत पर पानी फिरने जैसा था। हालांकि यह प्राकृतिक प्रकोप के कारण हुआ था। बावजूद इसके जिम्मेदारी निगम की बनती है। हालांकि, इस बार भी कई सोशल मीडिया पर रावण का पुतला खड़ा होने व जलने को लेकर अफवाहें फेलाई जा रही है।

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