मरीज निजी अस्पताल में भर्ती, सरकारी मशीनरी रिपोर्ट में कह रही स्वस्थ

प्रभारी बोले: किसी ने 'लिखित' शिकायत नहीं दी

मरीज निजी अस्पताल में भर्ती, सरकारी मशीनरी रिपोर्ट में कह रही स्वस्थ
गंभीर रूप से बीमार एक मरीज का कोटा के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है।

कोटा। सुल्तानपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) में आईवी फ्लूइड (ग्लूकोज की बोतलें) चढ़ाने से मरीजों की तबीयत बिगड़ने के मामले ने चिकित्सा विभाग में चल रही ढाँक-छुपी को फिर से उजागर कर दिया है। दरअसल सीएचसी प्रभारी डॉ. श्याम बिहारी मालव द्वारा जयपुर मुख्यालय और कोटा के उच्चाधिकारियों को भेजी गई आधिकारिक रिपोर्ट' में दावा किया है कि ग्लूकोज से प्रभावित हुए तीनों मरीज अब 'स्वस्थ' हैं। जबकि हकीकत यह है कि गंभीर रूप से बीमार एक मरीज दिनेश गोचर का कोटा के निजी अस्पताल में इलाज चल रहा है। अभी तक इस रिपोर्ट पर विभाग के अधिकारियों की तरफ से स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है।

रिपोर्ट का सच: रात को बिगड़ी हालत, आनन-फानन में किया रेफर
सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, डोबरली निवासी दिनेश गोचर (45) को 23 मई की रात 08:20 बजे बुखार और उल्टी की शिकायत पर भर्ती किया गया था। रात 08:30 बजे ड्यूटी डॉक्टर कमल मालव ने उन्हें मुख्यमंत्री निशुल्क दवा योजना के तहत कल्ल्न. फछ (ग्लूकोज) व अन्य इंजेक्शन लगाए। बोतल चढ़ने के महज आधा घंटे बाद रात 09:00 बजे दिनेश को तेज कंपकंपी, ठंड और खुजली के साथ उल्टियां शुरू हो गईं। हालत बिगड़ती देख डॉक्टरों ने उन्हें एंटी-एलर्जिक और जीवन रक्षक इंजेक्शन दिए।
रिपोर्ट में मालव खुद स्कवीकार रहे हैं कि रात 10:15 बजे मरीज को 108 एम्बुलेंस से एमबीएस अस्पताल कोटा रेफर किया गया, लेकिन परिजन उन्हें निजी अस्पताल ले गए जहां उनका इलाज जारी है। इसके बावजूद प्रभारी ने मुख्यालय को भेजे जवाब में मरीज को 'स्वस्थ' लिखा है।

दो अन्य मरीजों की भी चढ़ाई बोतल, कांपने लगे शरीर
रिपोर्ट में दो अन्य प्रभावित मरीजों का भी बिंदुवार ब्योरा दिया गया है जिसमें मरीज चिंटू (30), चम्पाखेड़ा निवासी है इन्हें 19 मई को दोपहर 01:00 बजे यूटीआई की शिकायत पर भर्ती किया गया। दोपहर 01:20 बजे डॉ. श्याम मालव ने इन्हें कल्ल्न. ऊठर चढ़ाया। ठीक 20 मिनट बाद मरीज को तेज ठंड, कंपकंपी और खुजली होने लगी। काउंटर ट्रीटमेंट देकर दोपहर 02:30 बजे डिस्चार्ज किया गया। वही दुसरी मरीज शबाना (34), नोताडा की है इन्हें 23 मई की रात 07:10 बजे दस्त की शिकायत पर भर्ती किया गया। रात 07:25 बजे चढ़ते ही रात 07:45 बजे शरीर कांपने लगा और उल्टियां शुरू हो गईं। इन्हें भी रात 09:00 बजे डिस्चार्ज किया गया। हालाकि इन दोनों के परिजनों से बात करने पर उन्होंने पुरी स्वस्थ होने की बात कही।

बचाव की मुद्रा में विभाग: 'मरीजों ने लिखित में शिकायत नहीं की'
इस पूरी रिपोर्ट में खास बात यह है कि प्रभारी ने तीनों मरीजों के कॉलम में नीचे एक जैसी लाईन लिखी है- मरीज द्वारा उक्त उपचार तथा दवा के संबंध में किसी भी प्रकार की लिखित में शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। जानकार इसे चिकित्सा विभाग का खुद को बचाने का पैंतरा मान रहे हैं, क्योंकि जब पूरे प्रदेश में इस बैच की दवाइयों को संदिग्ध मान कर सप्लाई रोकी जा चुकी है और बची दवाएं सील की गई हैं, तो विभाग जांच के लिये लिखित शिकायत का बहाना क्यों बना रहा है?

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सवाल कागजों में 'स्वस्थ', अस्पताल के बेड पर मरीज!
सरकारी सिस्टम की संवेदनहीनता देखिए कि सुल्तानपुर सीएचसी के अधिकारी ने जयपुर मुख्यालय (नोडल अधिकारी), संयुक्त निदेशक कोटा और सीएमएचओ कोटा को भेजी रिपोर्ट में यह लिख दिया कि 'मरीज वर्तमान में स्वस्थ है'। सवाल यह उठता है कि अगर मरीज पूरी तरह स्वस्थ था, तो उसे रात के 10:15 बजे सरकारी 108 एम्बुलेंस बुलाकर कोटा के हायर सेंटर क्यों रेफर करना पड़ा? और अगर वह स्वस्थ है तो आज भी निजी अस्पताल के बेड पर उसका इलाज क्यों चल रहा है? विभागीय आंकड़ों की बाजीगरी मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है।

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 आज मिटिंग की व्यस्तता के चलते मुझे इस मामले की ज्यादा अपडेट नहीं है। हाँलाकि फेक्चुअल रिपोर्ट हमें मिल गयी है मैने अभी नहीं देखी।
- डॉ. घनश्याम मीणा , डिप्टी सीएमएचओ कोटा 

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