जानें राज काज में क्या है खास 

परेशानी में साहब 

जानें राज काज में क्या है खास 

कहावत है कि नया नौ दिन और पुराना सौ दिन चलता है।

नया नौ दिन-पुराना सौ दिन :

कहावत है कि नया नौ दिन और पुराना सौ दिन चलता है। यह कहावत इन दिनों सूबे में भगवा वाले भाई लोगों पर चरितार्थ हो रही है। अब देखो न, पिंकसिटी में नया सदर तो बना दिया, लेकिन सूबे के सदर को पुराने पर ही ज्यादा भरोसा है। सरदार पटेल मार्ग स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले के ठिकाने पर वर्कर्स में चर्चा है कि संगठन के कामों की जिम्मेदारी पुराने सदरों को कॉर्डिनेटर की आड़ में सौंपने के पीछे कोई न कोई गहरा राज है। अब पिंकसिटी के न्यू प्रेसीडेंट के पास कुर्सी की शोभा बढाने के सिवाय कोई बड़ा काम नहीं बचा है। चूंकि सारे काम तो कॉर्डिनेटर की आड़ में पुरानों से ही लिए जा रहे हैं। अब ठिकाने पर आने वाले वर्कर्स को कौन समझाए कि सुमेरपुर वाले भाई साहब के तौर तरीकों को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।

बेसब्री से इंतजार :

सूबे में इन दिनों सूचियों का बेसब्री से इंतजार है। इंतजार भी भगवा वाले भाई लोगों के साथ ही ब्यूरोक्रेट्स को भी है। स्टेट कॉउंसलिंग में आने के लिए भगवा वाले कई वर्कर्स एड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं। जयपुर से दिल्ली तक की दौड़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे, मगर सूचियों के आने का कोई संकेत ही नहीं है। ब्यरोक्रेसी के कई साहबों की भी नींद उड़ी हुई है। आधा साल हो गया, उनका न तो काम में मन लग रहा है और नहीं नीति बना पा रहे है। राज का काज करने वालों की मानें, तो भगवा वालों की स्टेट काउंसलिंग की सूची अभी कई दांवपेचों में उलझी हुई है। अब कहने वालों का मुंह तो पकड़ा नहीं जा सकता, लेकिन सूबे के सदर के सामने खुद का मुंह बंद रखने के सिवाय कोई चारा भी तो नहीं है।

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असर काले और खाकी का :

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इन दिनों सूबे में कोट के रंगों को लेकर काफी गरमाहट है। राज के साथ काज करने वाले भी कोट के रंगों में इतने डूबे हैं कि आसपास वालों तक को भूल गए। कोट के रंगों की चर्चा भी क्यों न हो, उनका दर्जा कुछ स्पेशल है। सूबे में इन दिनों तीन रंगों के कोट हर आम आदमी की जुबान पर हैं। एक है सफेद रंग का कोट, जिसे पहनने वालों को धरती का भगवान मानकर पूजा जाता है। दूसरा है काले रंग का कोट, जिसे न्याय के देवता ही पहचान सकते हैं। तीसरे कोट का रंग खाकी है, जिसे केवल डंडे वाले ही पहचान सकते हैं। तीनों रंग वाले कोट अपनी मर्जी से ही चलते हैं। इन पर किसी का राज नहीं चलता। अब देखो न, काले और खाकी कोट वालों के बीच पिछले दिनों जो कुछ हुआ, उसे देख और सुनकर ही जायका बिगड़ जाता है। सफेद कोट वालों ने गुजरे जमाने में जो कुछ किया था, उससे तो भगवान तक घबरा गए थे। पिछले पांच महीने से काले और खाकी रंगों ने अपना-अपना असर दिखा रखा है। चर्चा है कि काला रंग तो काला ही होता है, उसके तार सीधे शनि से जुडेÞ हुए हैं, सो उस पर किसी भी दाग का असर नहीं होता।

परेशानी में साहब :

राज का काज करने वाले कुछ ब्यूरोक्रेट्स इन दिनों अजीब स्थिति में हैं, वो समझ नहीं पा रहे कि आखिर क्या रास्ता निकाला जाए। लंच केबिनों में भी जमकर माथापच्ची कर ली, पर पार नहीं पड़ी। कुछ साहब लोग भगवा वाली मैडम के साथ ही भाई साहबों से मिलने के लिए बेताब हैं, पर अटारी वाले भाई साहब के जासूसों से डरे हुए हैं। मैडम का खुफिया तंत्र मजबूत जो ठहरा, जो काफी समझदार थे, वो पहले ही सूबे से बाहर हैं। जब मन में आए, तब हाजिरी भर आते हैं। अब कुछ और ब्यूरोक्रेट्स बाहर जाने वालों की कतार में हैं। मगर यूपी से ताल्लुक रखने वाले एक साहब खुद ही फाइल पर नोटिंग करने में चूक नहीं करते, जिससे फाइल ऊपर के बजाय नीचे ही लौट आती है।

-एल. एल. शर्मा 
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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