रामायण के सातों कांड से श्रीराम के वनवास मार्ग तक, ‘अपनी-अपनी रामायण’ में समेटे जीवन के अनमोल संदेश
रामराज्य, मर्यादा और सुशासन का जीवंत संदेश
जयपुर। रामायण केवल धार्मिक ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन में कर्तव्य, सेवा और समर्पण के मूल्यों को समझने का माध्यम भी है। इसी विचार के साथ शहर के वरिष्ठ त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. दिनेश माथुर की पुस्तक ‘अपनी-अपनी रामायण’ का विमोचन रविवार सुबह झालाना स्थित आरआइसी के सभागार में हुआ। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन मूल्यों और शिक्षाओं को आमजन की दिनचर्या में शामिल करने के उद्देश्य से लिखी गई इस पुस्तक में महर्षि वाल्मीकि की रामायण और गोस्वामी तुलसीदास कृत रामचरितमानस का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।
बालकांड से लंकाकांड तक सातों कांडों के प्रसंगों और श्रीराम के राज्याभिषेक को सहज, सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। कार्यक्रम में डॉ. माथुर ने बताया कि इस परियोजना पर पिछले डेढ़ साल से काम किया जा रहा था। उद्देश्य रामायण के प्रसंगों और उनके जीवनोपयोगी संदेशों को सामान्य पाठकों तक सहज रूप में पहुंचाना है। पुस्तक के अंतिम अध्याय में श्रीराम की यात्रा और वनवास मार्ग को विशेष स्थान दिया गया है। वनवास के दौरान भारतवर्ष में श्रीराम से जुड़े विभिन्न स्थानों को चिह्नित कर उनके वर्तमान स्वरूप को तस्वीरों के माध्यम से दिखाया गया है।
पंचवटी और अशोक वाटिका सहित अनेक स्थलों की विस्तृत व्याख्या के साथ श्रीलंका में रामायण से जुड़े स्थानों की जानकारी भी प्रमुखता से दी गई है। डॉ. माथुर ने कहा कि यह पुस्तक पाठक को उस दौर में ले जाती है, जब मर्यादा, न्याय और जनकल्याण शासन के मूल आधार थे। इसके प्रसंगों से सुशासन और रामराज्य की परिकल्पना जीवंत होती है।

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