गरबा-डांडिया : जयपुर में मां-बच्चे की एक जैसी पोशाक बना नया चलन, पसंद के परिधान बनवाने पर जोर
आभूषणों के ताल-मेल से पूरा हो रहा रूप
जयपुर। नवरात्र की आहट होते ही शहर में गरबा-डांडिया की तैयारियां जोर पकड़ने लगती हैं। इन तैयारियों में पहनावे का एक नया रंग जुड़ गया है। शहर में होने वाले उत्सवी आयोजनों के लिए मां और बच्चे अब एक जैसी पोशाक चुनने लगी हैं। कभी त्योहार पर मां बेटी को सजाती थीं, पर अब दोनों साथ बैठकर रंग, कढ़ाई और नमूने तय करती हैं।
मां-बच्चे की जोड़ी, एक जैसा अंदाज : गरबा-डांडिया की शामों में चनिया-चोली, घाघरा-चोली और पारंपरिक लहंगे सबसे ज्यादा पसंद किए जाते हैं। मां-बेटी के लिए एक जैसा रंग, मिलती-जुलती कढ़ाई और पारंपरिक गुजराती अंदाज इस जोड़ी को भीड़ में अलग पहचान देता है। जयपुर की मेघा बिनावरा ने बताया कि समान रंग, कढ़ाई या छपाई की छोटी-सी झलक एकरूप अंदाज बना देती है। पिछले एक-दो सालों से अपने कपड़ों से मेल खाते रंगों में बच्चें के परिधान चुन रही हूं।
अपनी पसंद का परिधान, अपनी पहचान : अब केवल बने-बना, कपड़े खरीदने के बजाय पसंद के मुताबिक परिधान तैयार करवाने की ओर भी रुझान दिख रहा है। इनमें शीशे का काम, बंधेज, लहरिया और गोटा-पत्ती जैसे नमूने खास आकर्षण रखते हैं। अपनी पसंद का परिधान बनवाने वाले कपड़ा, रंग, कढ़ाई और नाप खुद तय कर सकते हैं। पोशाक तब पूरी लगती है, जब उसके साथ सही आभूषण हों। झुमके, चांदबाली, चूड़ियां, मांगटीका और कमरबंद पारंपरिक पहनावे को और आकर्षक बनाते हैं।
सुंदरता के साथ सुविधा भी जरूरी :
गरबा और डांडिया में देर तक नृत्य करना होता है, इसलिए पोशाक की नाप और आराम भी उतने ही मायने रखते हैं। बहुत भारी आभूषण, लंबे दुपट्टे और असुविधाजनक जूते-चप्पल नृत्य के दौरान परेशानी बन सकते हैं।

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