ना प्रचार का शोर, ना जीत-हार का झंझट : प्रदेश के कई गांवों में लोग मिल बैठकर तय कर लेते हैं पंच-सरपंच
कहीं 74 साल से नहीं पड़ा वोट
जयपुर। चुनाव का नाम दिमाग में आते ही सामने आता है वो प्रचार का शोर, तेरा उम्मीदवार, मेरा उम्मीदवार और फिर वही झगड़े और दिलों में रहने वाला मनमुटाव, लेकिन इन सबसे इतर राजस्थान के कुछ गांवों में एक अलग ही तस्वीर पेश की है। यहां प्रतिनिधि चुनने के लिए न तो लंबा चुनावी प्रचार होता है और न ही जीत-हार की होड़। ग्रामीण आपस में बैठते हैं, विचार-विमर्श करते हैं और सहमति से अपने गांव की सरकार चुन लेते हैं। कहीं यह परंपरा आजादी के बाद से चली आ रही है तो कहीं चार दशक से ग्रामीण इसी राह पर चल रहे हैं। ये उदाहरण बताते हैं कि आपसी विश्वासए सामाजिक समरसता और सामूहिक निर्णय की भावना मजबूत हो तो चुनावी मुकाबले के बिना भी लोकतंत्र की जड़ें मजबूत की जा सकती हैं। बांसवाड़ा जिले की गनोड़ा तहसील की भुवासा ग्राम पंचायत के सज्जन सिंह का गढ़ गांव में 1952 से वार्ड पंच के लिए मतदान नहीं हुआ। ग्रामीण भाईचारे और सहमति से प्रतिनिधि चुनते हैं। यह परंपरा सामूहिक निर्णय की मिसाल है।
40 साल से उमराखाल में नहीं हुआ मुकाबला :
बांसवाड़ा के उमराखाल गांव में करीब 40 साल से वार्ड पंच निर्विरोध चुने जा रहे हैं। गांव के करीब 150 परिवार एक साथ बैठकर गांव के लिए कौन बेहतर है, उसके नाम पर सहमति बनाते हैं। ग्रामीण इसे एकजुटता की परंपरा मानते हैं।
36 कौमों ने चुनी पूरी पंचायत :
बीकानेर जिले की पूगल पंचायत समिति की पार्वती तलाई ग्राम पंचायत में 2026 में सरपंच सहित सभी सात वार्ड पंच निर्विरोध चुने गए। 36 कौमों ने चर्चा के बाद सरपंच पद पर महेंद्र सिंह भाटी के नाम पर सहमति जताई। हर वार्ड में एक प्रत्याशी रहा।
सांपला में पर्चियों से तय हुए नाम :
अजमेर जिले की सरवाड़ पंचायत समिति की सांपला ग्राम पंचायत में सरपंच अर्जुन सिंह राठौड़ सहित सभी 11 वार्ड पंच निर्विरोध चुने गए। सरपंच पद के छह दावेदारों में पांच ने नाम वापस लिए। एक से अधिक दावेदार वाले वार्डों में पर्चियों से नाम तय हुए और बाकी सहमत हो गए।
डूंगरपुर-कोटा में भी सहमति :
डूंगरपुर की रामसौर-जुना पंचायत में 2026 में सरपंच जयंतीलाल डामोर सहित सभी सात वार्ड पंच निर्विरोध चुने गए। कोटा की नवसृजित गिरधरपुरा पंचायत में सरपंच भूरीबाई और सभी सात वार्ड पंच भी निर्विरोध चुने गए।
बाड़मेर में दशकों से परंपरा :
बाड़मेर की वीरेंद्र नगर ग्राम पंचायत में भी निर्विरोध निर्वाचन की परंपरा रही है। भीखी देवी 1984 में पहली बार सरपंच बनीं और 2026 में सातवीं बार निर्विरोध चुनी गईं। उनके साथ सभी सात वार्ड पंच भी निर्विरोध निर्वाचित हुए।
लोकतंत्र की खूबसूरती आपसी विश्वास :
इन गांवों में ग्रामीणों ने प्रतिस्पर्धा के बजाय सामूहिक सहमति को महत्व दिया। हालांकि निर्विरोध निर्वाचन तभी एकता की मिसाल है, जब फैसला स्वैच्छिक हो और हर व्यक्ति की राय का सम्मान हो। मतदान का अधिकार जरूरी है, मतभेदों के बावजूद संवाद से समाधान निकालना भी लोकतंत्र है। गांव की ताकत चुनाव के बाद भी एकजुट रहने में है।

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