गणतंत्र दिवस विशेष : चार शब्द, एक गणराज्य ; जिस दिन भारत ने 'नागरिक' को जन्म दिया
26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान की प्रस्तावना में दर्ज न्याय
26 जनवरी सिर्फ. एक तारीख नहीं है। यह वह सुबह है जब भारत ने पहली बार खुद से कहा था—हम शासित नहीं, स्वशासित। 1950 की उस सुबह संविधान लागू हुआ और उसके पहले ही पन्ने यानी प्रस्तावना में चार ऐसे शब्द दर्ज हुए जिन्होंने भारत को केवल एक राष्ट्र नहीं, एक नैतिक परियोजना में बदल दिया—न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता।
जयपुर। 26 जनवरी सिर्फ. एक तारीख नहीं है। यह वह सुबह है जब भारत ने पहली बार खुद से कहा था—हम शासित नहीं, स्वशासित हैं। 1950 की उस सुबह संविधान लागू हुआ और उसके पहले ही पन्ने यानी प्रस्तावना में चार ऐसे शब्द दर्ज हुए जिन्होंने भारत को केवल एक राष्ट्र नहीं, एक नैतिक परियोजना में बदल दिया—न्याय, स्वतंत्रता, समता और बंधुता। ये शब्द न नारे थे, न सजावटी वाक्य; ये उस नागरिक के लिए शर्तें थीं, जिसे आजादी के बाद पहली बार इतिहास ने केंद्र में रखा।
समता ने शायद सबसे बड़ा सामाजिक हस्तक्षेप किया। कानून किसी को जन्म के आधार पर छोटा नहीं मानेगा। अस्पृश्यता का अंत, जाति और लिंग के आधार पर भेदभाव का निषेध और समान अवसर का सिद्धांत—इन सबने नागरिक की पहचान को वंश से हटाकर संविधान से जोड़ दिया। सामाजिक पदानुक्रम, जिसे सदियों से स्वाभाविक माना गया था, पहली बार खुली चुनौती के सामने आया। गरिमा का अधिकार और बराबरी की भाषा इसी समता की देन है।
स्वतंत्रता को संविधान ने किसी ऐतिहासिक स्मृति की तरह नहीं, रोजमर्रा के अधिकार की तरह परिभाषित किया। सोचने, बोलने, लिखने, असहमत होने, और धर्म मानने या न मानने की स्वतंत्रता—इन सबने नागरिक को चुप रहने वाला नहीं, प्रश्न पूछने वाला बनाया। सत्ता, जो सदियों तक आलोचना से ऊपर रही थी, पहली बार सवालों के सामने खड़ी हुई। डर के बिना सोचने की जगह और अभिव्यक्ति का साहस लोकतंत्र की असली पूंजी बना।
संविधान ने न्याय को केवल अदालतों की दहलीज तक सीमित नहीं किया। उसने साफ कहा कि न्याय सामाजिक होगा, आर्थिक होगा और राजनीतिक होगा। यानी नागरिक को जाति, धर्म या लिंग के आधार पर अपमानित नहीं किया जा सकेगा; कानून के सामने सभी बराबर होंगे; और राज्य पहली बार जवाबदेह होगा। नागरिक अब प्रजा नहीं रहा। वह अधिकार संपन्न हो गया। शासक कानून के अधीन आ गया। संविधानिक उपचार का अधिकार, मनमाने शासन के खिलाफ सुरक्षा और गलत के सामने खड़े होने का नैतिक साहस—यह सब एक नागरिक को मिला।
संविधान का सबसे कम उद्धृत, लेकिन सबसे गहरा शब्द। बंधुता कहती है कि तुम अलग हो सकते हो, लेकिन अकेले नहीं हो। भाषा, धर्म, क्षेत्र और संस्कृति से ऊपर नागरिकता की साझा भावना; हिंसा के विरुद्ध सह-अस्तित्व; और लोकतंत्र की सामाजिक आत्मा—यह सब बंधुता से आता है। इसी ने नागरिक को भीड़ से निकालकर समाज का सदस्य बनाया और राष्ट्र को महज भूगोल से आगे, एक साझा संवेदना में बदला।

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