कृष्ण राजस्थान में कैसे दिखते हैं... नाथद्वारा से किशनगढ़ तक रंगों में रची पांच अलग-अलग छवियां
जयपुर में कृष्ण राजसी वैभव स्वरूप में
जयपुर। राजस्थान में कृष्ण केवल भक्ति के आराध्य नहीं बल्कि कला, संस्कृति, संगीत और लोकजीवन के ऐसे केंद्र हैं, जिनके रूप को अलग-अलग क्षेत्रों और राजदरबारों ने अपनी कल्पना, सौंदर्यबोध और परंपराओं के अनुरूप चित्रित किया। जन्माष्टमी के अवसर पर राजस्थान की चित्रकला परंपराओं को देखें तो एक ही कृष्ण कहीं नटखट बालक हैं, कहीं गोपाल, कहीं प्रेमी नायक तो कहीं राजसी वैभव से युक्त दैवी सत्ता के रूप में नजर आते हैं। नाथद्वारा से किशनगढ़ और मेवाड़ से बूंदी-कोटा तक कृष्ण की यह विविध छवि राजस्थान की समृद्ध कला विरासत को सामने लाती हैं।
नाथद्वारा की पिछवाई में भक्ति और वैभव : नाथद्वारा की पिछवाई चित्रकला में श्रीनाथजी के रूप में श्रीकृष्ण की आराधना का विशिष्ट संसार दिखाई देता है। मंदिर की सेवा-परंपरा से जुड़ी इन चित्रकृतियों में तुए उत्सव, गोवर्धन, कमल, गायों और वृंदावन के प्रसंगों को सजावटी सौंदर्य के साथ प्रस्तुत किया जाता है।
मेवाड़ में कृष्ण भक्ति और लोकजीवन के करीब : मेवाड़ शैली के चित्रों में कृष्ण कथाओं को सरल, जीवंत और कथात्मक रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा दिखाई देती हैं। रासलीला, गोवर्धनधारण, बाल-कृष्ण की लीलाएं और ग्वाल-बालों के प्रसंगों में कृष्ण को लोकजीवन से जुड़े पात्र के रूप में देखा जा सकता है।
बूंदी और कोटा में प्रकृति के बीच श्रीकृष्ण : बूंदी और कोटा की चित्रशैलियों में प्रकृति का विशेष महत्व है। घने वृक्ष, पहाड़, जलाशय, बादल और वन्य परिवेश श्रीकृष्ण की लीलाओं की पृष्ठभूमि बनते हैं। विशेष रूप से राग-रागिनी और दरबारी चित्रों में रंगों और प्राकृतिक दृश्यों का सुंदर सामंजस्य देखने को मिलता है।
किशनगढ़ में प्रेम और सौंदर्य का कृष्ण : किशनगढ़ शैली कृष्ण की प्रेममय छवि को अत्यंत सौंदर्यपूर्ण ढंग से सामने लाती हैं। राधा-कृष्ण के प्रेम, विरह और मिलन के प्रसंगों को इस शैली की पहचान हैं। किशनगढ़ की प्रसिद्ध ‘बणी-ठणी’परंपरा ने राधा-कृष्ण के प्रेम संसार को विशिष्ट दृश्य भाषा प्रदान की।
जयपुर में कृष्ण राजसी वैभव स्वरूप में : गोविन्द देवजी के श्रीकृष्ण राजसी, दिव्य और वैभव स्वरूप में दिखाई देते हैं। इनमें दरबारी वातावरण, आभूषण, वस्त्र और शृंगार का चित्रण। गोपीनाथजी के चित्रांकन में श्रीकृष्ण के माधुर्य, श्रीराधा-कृष्ण भाव और वृन्दावन की लीलाओं पर अधिक जोर।

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