सहकारिता विभाग में न्यायिक मामलों की स्थिति : 2897 मुकदमे, 69 में जवाब तक नहीं, 131 मामले 20 साल से ज्यादा पुराने
85 मामलों में विभाग के खिलाफ स्थगन आदेश
जयपुर। सहकारिता विभाग से जुड़े न्यायिक मामलों की निगरानी में कई गंभीर लंबितताएं सामने आई हैं। विभाग की एलआईटीईएस वेबसाइट पर 2897 न्यायिक प्रकरण दर्ज हैं। इनमें जवाब-दावा प्रस्तुत नहीं किए जाने वाले 123 मामले अभी लंबित हैं। खास बात यह है कि 69 मामले ऐसे हैं, जिनमें जवाब तीन माह से लेकर एक साल से भी अधिक समय से लंबित है। रिव्यू के दौरान विभाग ने इन मामलों में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। एक साल से पुराने 11 मामलों और तीन माह से पुराने 58 मामलों में अगली समीक्षा बैठक से पहले जवाब प्रस्तुत कराने को कहा गया है। एक साल से पुराने मामलों में जवाब नहीं देने वाले प्रभारी अधिकारियों को कारण बताओ नोटिस जारी करने की कार्रवाई के निर्देश भी दिए गए हैं। विभाग के संयुक्त रजिस्ट्रार (विधि) डॉ. नंदिता राठौड़ ने प्रकरणों की आगामी सुनवाई तिथि लाईट्स वेबसाइट पर अपडेट करने और रिव्यू कार्यवाही को लेकर आदेश जारी किए हैं।
20 साल पुराने 131 मामले, 85 में विभाग के खिलाफ स्टे :
न्यायिक मामलों की लंबी लंबितता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि 20 साल से अधिक पुराने 131 प्रकरण अभी भी लंबित हैं। विभाग ने इन मामलों में अतिरिक्त महाधिवक्ता और राजकीय अधिवक्ताओं से संपर्क कर शीघ्र सुनवाई के लिए न्यायालय में प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कराने के निर्देश दिए हैं। वहीं 85 मामलों में विभाग के खिलाफ स्थगन आदेश और 11 मामलों में स्थगन आदेश राज्य पक्ष में होने की जानकारी बैठक में दी गई। विभाग के खिलाफ जारी स्थगन आदेशों को शीघ्र हटवाने तथा सभी मामलों की स्थिति अद्यतन करने को कहा गया है।
अगली सुनवाई की तारीखें भी समय पर अपडेट नहीं :
बैठक में सामने आया कि अगली सुनवाई की तारीख अद्यतन करने वाले लंबित मामलों की संख्या 588 से बढ़कर 689 हो गई। इसके अलावा 381 मामले ड्यू कोर्स में लंबित बताए गए। विभाग ने न्यायालय की वेबसाइट से एक माह के भीतर इन मामलों की स्थिति अद्यतन कराने और अनुपालना रिपोर्ट देने के निर्देश दिए हैं।
आमजन के लिए इसका मतलब :
सहकारी समितियों, बैंकों, आवास संस्थाओं और अन्य सहकारी संस्थाओं से जुड़े विवादों का असर सीधे सदस्यों और आम नागरिकों पर पड़ सकता है। लंबे समय तक मुकदमों के लंबित रहने, स्थगन आदेश जारी रहने या न्यायालय के आदेशों की अनुपालना में देरी से संपत्ति, सदस्यता, भुगतान और अन्य मामलों का निपटारा प्रभावित हो सकता है। इसी कारण विभाग ने न्यायिक प्रकरणों की निगरानी और एलआईटीईएस में सही एवं समयबद्ध जानकारी दर्ज करने पर जोर दिया है।

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