ऐतिहासिक रिकॉर्ड स्तर पर फिसला रुपया: अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ₹96.76 पर पहुंचा, बाजार में मची खलबली
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
मुंबई। घरेलू शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों (FIIs) की चौतरफा बिकवाली और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल के कारण आज भारतीय मुद्रा बाजार में भारी उथल-पुथल देखी गई। गुरुवार, 8 अक्टूबर 2026 को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार (फॉरेक्स) में भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर ₹96.76 पर है। पिछले कारोबारी सत्र में डॉलर के मुकाबले रुपया ₹96.37 के स्तर पर बंद हुआ था। सुबह कारोबार की शुरुआत से ही रुपये पर दबाव साफ दिखाई दे रहा था। यह शुरुआती सत्र में ₹96.65 पर खुला और वैश्विक बाजार से मिले कमजोर संकेतों के चलते दिन के दौरान टूटता चला गया।
गिरावट के मुख्य कारण: क्यों टूट रही है भारतीय मुद्रा?
बाजार विश्लेषकों और फॉरेक्स डीलरों के अनुसार, इस समय रुपये पर तीन बड़े वैश्विक और घरेलू कारकों का दबाव है:
विदेशी फंडों की अंधाधुंध निकासी: भारतीय इक्विटी मार्केट (शेयर बाजार) से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक लगातार अपना पैसा निकाल रहे हैं, जिससे डॉलर की मांग में भारी इजाफा हुआ है।
कच्चे तेल में उबाल: भू-राजनीतिक तनावों के बीच अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमतें 75 से 80 डॉलर प्रति बैरल के दायरे में बनी हुई हैं। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे तेल आयातकों की तरफ से डॉलर की मांग काफी बढ़ गई है।
मजबूत होता डॉलर इंडेक्स: दुनिया की छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की मजबूती दर्शाने वाला डॉलर इंडेक्स लगातार बढ़त पर है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं पर असर पड़ रहा है।
आम जनता और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
रुपये के कमजोर होने से भारतीय आयातकों की लागत बढ़ेगी। विशेष रूप से कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कल-पुर्जे और खाद्य तेलों का आयात महंगा होने से देश में घरेलू स्तर पर महंगाई की चिंताएं बढ़ सकती हैं। हालांकि, इस गिरावट से देश के आईटी (IT) और फार्मा जैसे निर्यात-आधारित सेक्टर्स को फायदा मिलने की उम्मीद है, क्योंकि उन्हें डॉलर में होने वाली कमाई के बदले अधिक रुपये मिलेंगे। ट्रेडर्स का मानना है कि यदि विदेशी निवेशकों की बिकवाली नहीं थमी, तो आने वाले दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को रुपये को संभालने के लिए अपने विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग कर बाजार में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है।

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