कार्रवाई से पूर्व सुनवाई का मौका देना है प्राधिकारी की बाध्यकारी ड्यूटी : हाईकोर्ट

याचिकाकर्ता को सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया है

कार्रवाई से पूर्व सुनवाई का मौका देना है प्राधिकारी की बाध्यकारी ड्यूटी : हाईकोर्ट

दूसरी ओर एनटीए और परीक्षा आयोजक की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता परीक्षा के दौरान पास बैठे दूसरे अभ्यर्थी की कॉपी से नकल कर रहा था।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि किसी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल कार्रवाई करने या आदेश पारित करने से पूर्व उसे सुनवाई का मौका देना संबंधित प्राधिकारी की बाध्यकारी ड्यूटी है और वह इससे इनकार नहीं कर सकता। साथ ही अदालत ने विद्यार्थी के नकल से जुड़े इस मामले में एनटीए और जेईई परीक्षा आयोजक को कहा है कि वह याचिकाकर्ता का पक्ष सुनकर नए सिरे से आदेश पारित करे। अदालत ने याचिकाकर्ता को कहा है कि वह एक सप्ताह में संबंधित प्राधिकारी के समक्ष पेश हो और प्राधिकारी उसका पक्ष सुनकर दो सप्ताह में नया आदेश जारी करे। जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह आदेश माहिर बिश्नोई की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए। अदालत ने कहा कि मामले में याचिकाकर्ता को सुनवाई के अधिकार से वंचित किया गया है। उस पर लगाया गया दंड उसके करियर को बर्बाद कर देगा और आने वाले समय में यह कलंक उसके साथ रहेगा।

साथ ही उसे रोजगार पाने में भी बाधा उत्पन्न होगी याचिका में अधिवक्ता दीपक बिश्नोई ने अदालत को बताया कि याचिकाकर्ता ने जेईई मेंस, 2025 की परीक्षा दी थी, लेकिन परीक्षा में अनुचित साधन का उपयोग करने का बताकर उसका परिणाम रोक लिया गया। उसे आगामी दो सत्रों की परीक्षा देने के लिए अपात्र घोषित कर दिया। याचिका में कहा गया कि परीक्षा कक्ष के सीसीटीवी फुटेज के आधार पर यह कार्रवाई की गई है। जबकि संबंधित प्राधिकारी ही इस साक्ष्य को लेकर स्पष्ट नहीं है। कार्रवाई से पहले न तो उसे नोटिस दिया गया और ना ही उसे सुनवाई का मौका मिला। जबकि नियमानुसार किसी भी व्यक्ति के खिलाफ प्रतिकूल फैसला देने से पहले उसे सुना जाना जरूरी है।

दूसरी ओर एनटीए और परीक्षा आयोजक की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता परीक्षा के दौरान पास बैठे दूसरे अभ्यर्थी की कॉपी से नकल कर रहा था। दोनों अभ्यर्थियों की उत्तर पुस्तिका में उत्तर शब्दश: लिखे गए थे। यह सब सीसीटीवी में भी रिकॉर्ड हुआ है। ऐसे में उसे अनुचित साधन का उपयोग करने का आरोपी मानते हुए अगले दो सत्रों की परीक्षा के लिए अयोग्य घोषित किया है। जिस पर सुनवाई करते हुए एकलपीठ ने संबंधित प्राधिकारी को मामले में याचिकाकर्ता को सुनकर नए सिरे से आदेश देने को कहा है। 

 

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