टिकट का ताला, वादों का पिटारा; निकाय चुनावों ने बढ़ाई विधायकों की धड़कनें
क्षेत्रों में संभावित दावेदारों को किसी न किसी रूप में संकेत दे रखे हैं
जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनावों की घोषणा के साथ ही चुनावी मौसम ने सिर्फ संभावित प्रत्याशियों की ही नहीं, बल्कि विधायकों की भी धड़कन बढ़ा दी है। अब तक जो विधायक हर दावेदार को मुस्कुराकर देखेंगे या बात करेंगे और आपका ध्यान रखेंगे जैसे भरोसे के जुमले सुनाकर आगे बढ़ रहे थे, उनके सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर सिफारिश करें तो किसकी करें और नाराज करें तो किसे। दरअसल, निकाय चुनावों की तैयारियों के बीच अनेक विधायकों ने अपने-अपने क्षेत्रों में संभावित दावेदारों को किसी न किसी रूप में संकेत दे रखे हैं। कई दावेदारों को तो इतना भरोसा दिलाया जा चुका है कि वे खुद को टिकट का लगभग पक्का उम्मीदवार मानकर चल रहे हैं। अब टिकट वितरण का समय नजदीक आते ही विधायक भी वादा प्रबंधन में उलझते नजर आ रहे हैं। मामला केवल आश्वासन तक सीमित नहीं है। चुनावी राजनीति में आयोजन, स्वागत-सत्कार, भीड़ जुटाने से लेकर छोटे-बड़े कार्यक्रमों में आर्थिक सहयोग तक की अपनी भूमिका होती है। कई संभावित प्रत्याशियों ने पिछले महीनों में विधायक के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़कर भागीदारी की है। किसी ने मंच संभाला तो किसी ने भीड़ जुटाई, किसी ने आयोजन की व्यवस्था में हाथ बंटाया तो किसी ने खर्चे में सहयोग किया। अब वही दावेदार टिकट की बारी आने पर हिसाब की डायरी खोलकर विधायक के सामने खड़े हैं।
विधायकों की मुश्किल यह है कि दावेदार एक नहीं, कई हैं। वार्डों की संख्या सीमित है और टिकट की इच्छा रखने वालों की सूची लंबी। एक को टिकट मिला तो दूसरे का राजनीतिक हिसाब बिगड़ना तय है। विधायक किसी एक के पक्ष में खुलकर बोलते हैं, तो दूसरा खेमा नाराज होने का जोखिम है। ऊपर से पार्टी संगठन की अपनी पसंद-नापसंद और स्थानीय समीकरण अलग हैं। सबसे दिलचस्प स्थिति उन विधायकों की है, जिन्होंने चुनाव से पहले अलग-अलग संभावित प्रत्याशियों को अलग-अलग मौकों पर भरोसा दिलाया था। किसी से कहा गया कि आपकी तैयारी अच्छी है। किसी को संकेत मिला कि ऊपर बात हो गई है। किसी से कहा गया कि आपका नाम मजबूत है। अब ये सभी वाक्य दावेदारों के पास सुरक्षित हैं और चुनाव की घोषणा के साथ उनका रिकॉर्ड प्ले होना शुरू हो गया है।
विधायक भी जानते हैं कि टिकट किसी एक को ही मिलना है, लेकिन जिसको टिकट नहीं मिलेगा, वह केवल नाराज नहीं होगा, बल्कि चुनाव में भीतरघात का खतरा भी पैदा कर सकता है। निकाय चुनावों में वार्ड स्तर के समीकरण बेहद अहम होते हैं। यहां कुछ सौ वोट भी परिणाम का रुख बदल सकते हैं। इसलिए विधायक किसी दावेदार को नाराज करने से पहले दस बार सोच रहे हैं। पार्टी के भीतर भी टिकट को लेकर खींचतान तेज होने की संभावना है। संगठन में सक्रिय कार्यकर्ता अपने सालों के परिश्रम का हवाला दे रहे हैं, जबकि प्रभावशाली दावेदार अपने जनाधार और व्यक्तिगत संपर्कों को आधार बना रहे हैं। कुछ ऐसे चेहरे भी मैदान में हैं जिनका दावा है कि वे विधायक के बेहद करीबी हैं। ऐसे में विधायक के लिए करीबी की परिभाषा तय करना भी मुश्किल हो गया है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आने वाले दिनों में विधायकों के दरवाजे पर दस्तक देने वालों की संख्या और बढ़ेगी। दावेदार अपने समर्थकों के साथ पहुंचेंगे, बायोडाटा देंगे, पुराने संबंधों की याद दिलाएंगे और जरूरत पड़ी तो विधायक के साथ खिंचवाई तस्वीरें भी दिखाएंगे। यानी टिकट की दौड़ में अब केवल संगठनात्मक सक्रियता नहीं, बल्कि पुराने वादों की फाइल भी खुल सकती है।
हालांकि अंतिम फैसला पार्टी संगठन और चुनावी समीकरणों के आधार पर ही होना है। यही वजह है कि विधायक भी फिलहाल सभी को साथ लेकर चलने की रणनीति पर हैं। किसी को साफ मना करने के बजाय आश्वासन की राजनीति जारी है। लेकिन जैसे-जैसे टिकट वितरण का समय करीब आएगा, यह संतुलन साधना मुश्किल होता जाएगा।
विधायक की डायरी में पांच मुश्किल सवाल
1-वादा किससे किया था
दावेदारों की संख्या बढ़ने के साथ पुराने आश्वासनों का हिसाब रखना मुश्किल हो रहा है।
2-खर्च किसने किया था
जिन लोगों ने कार्यक्रमों में आर्थिक या संगठनात्मक सहयोग किया है, वे अब उसका राजनीतिक रिटर्न चाहते हैं।
3-टिकट एक, दावेदार अनेक
एक वार्ड में कई मजबूत दावेदार होने से किसी एक का चयन बाकी को नाराज कर सकता है।
4-संगठन बनाम व्यक्तिगत पसंद
विधायक की पसंद और पार्टी संगठन की पसंद एक जैसी होना जरूरी नहीं। यही सबसे बड़ा पेंच बन सकता है।
5-टिकट नहीं तो क्या होगा
सबसे बड़ा डर यही है कि टिकट से वंचित दावेदार निर्दलीय मैदान में उतर जाए या भीतरघात का रास्ता पकड़ ले। विधायक इसी समीकरण को साधने में जुटे हैं।

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