बिजली के तार बन रहे वानरों के लिए काल, तीन विभागों के बीच पिस रहे घायल बंदर

पशु चिकित्सालय में इनके इलाज के लिए उचित व्यवस्था नहीं

बिजली के तार बन रहे वानरों के लिए काल, तीन विभागों के बीच पिस रहे घायल बंदर

पशु प्रेमी भुवन मलिक कर रहे घायल बंदरों की सेवा।

कोटा। निराश्रित गायों व आवारा श्वानों को पकड़कर निगम की गौशाला तक पहुंचाने की व्यवस्था है। लेकिन शहर में रोजाना घायल हो रहे कई बंदरों को समय पर उपचार दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है। नगर निगम, वन विभाग व पशु चिकित्सालय के बीच पिस रहे घायल बंदरों को समय पर उपचार नहीं मिल रहा। ऐसे में पशु प्रेमी भुवन मलिक स्वयं के खर्च पर घायल बंदरों की सेवा कर रहे हैं। पशुप्रेमी व योगाचार्य भुवन मलिक ने बताया कि उनके पास कुछ दिनों से घायल बंदरों के संबंध में कई फोन आ रहे हैं। वे उन्हें रेस्क्यू करके उनके इलाज के लिए नगर निगम में संपर्क करते हैं तो वहां से जिम्मेदारों द्वारा व्यस्त होने की सूचना मिलती है। वहीं पशु चिकित्सालय में इनके इलाज के लिए कोई उचित व्यवस्था नहीं होती है। जंतुआलय लेकर जाने पर वहां से जवाब मिलता है कि उनके यहां काले मुंह के बंदरों की ही व्यवस्था है। लाल मुंह का बंदर जंगली जीवों में आता है इनकी व्यवस्था नगर निगम करता है वहीं लेकर जाओ।

उन्होंने बताया कि घायल बंदरों के लिए न तो कोई अलग से बजट है न ही कोई विभाग। नगर निगम में व्यवस्था बताई जाती है तो वह भी न के बराबर कार्य करती है। उन्होंने बताया कि एक वृद्ध दंपत्ति व एक घर में कुछ महिलाएं और बच्चियां थी जो खुद घायल वानर के लिए कुछ कर सकने के सक्षम नहीं थी। उन्हें सूचना मिली तो वे अपने खर्चे से उसे पशु चिकित्सालय लेकर गए। वे लगातार इन घायल पशुओं की सेवा कर पा रहे हैं। लेकिन हर किसी के लिए यह सेवा कर पाना संभव नहीं है । जिससे लोग घायल वानरों की सेवा करने से पीछे हट रहे है।

पशुप्रेमी व योगाचार्य भुवन मलिक ने बताया कि वन भूमि खत्म होती जा रही है और कोटा सिमटता जा रहा है। विशाल वृक्ष अब बढ़ते शहरीकरण में खत्म होते जा रहे हैं और इसी के कारण वानर शहर में इधर उधर अपना पेट भरने और पनाह के लिए भटक रहे हैं। शहर में कहीं न कहीं जब तब बंदर दुर्घटनाओं के शिकार हो रहे हैं। कोई वाहन की चपेट में आ कर जान गंवा रहा है तो कोई बिजली के खंभों पर करंट की चपेट में आकर घायल हो रहे है। घायल इंसान के लिए रुकने वाले बहुत लोग हैं, इंसानों के लिए एंबुलेंस हैं, गाय के लिए भी हैं, कुत्तों के लिए भी कई पशु कल्याण संगठन काम कर रहे हैं। जबकि कोटा शहर में बंदरों के लिए कौन सेवा कार्य कर रहा है किसी को कोई खबर नहीं है। कुछ समाजसेवी प्रेमी बंदरों के लिए भी कार्य कर रहे हैं किंतु प्रशासन द्वारा उन्हें किसी भी प्रकार की सहायता न दिए जाने से वे भी लाचार हो गए हैं। शहर में लगभग हर दिन कोई वानर दुर्घटना का शिकार होता है। ज्यादातर घटनाएं बिजली के तारों पर झुलसने से हो रही हैं। इधर नगर निगम अधिकारियों का कहना है कि वे शहर से उत्पाती बंदरों को पकड़वाते हैं। इसके लिए टेंडर किया हुआ है। संवेदक फर्म के माध्यम से शिकायत पर बंदरों को पकड़कर शहर से दूर जंगल में छोड़ा जाता है।

इधर पशु चिकित्सालय के संयुक्त निदेशक गणेश नारायण दाधीच ने बताया कि घायल पशुओं के लिए 1962 पर कॉल कर वाहन मंगवाया जा सकता है। साथ ही पशु चिकित्सालय में किसी भी तरह के घायल पशुओं का उपचार किया जाता है। फिर चाहे वह गाय हो या कुत्ता या फिर बंदर। यहां बंदरों के आने पर उनका भी उपचार किया जा रहा है।

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