कैसे हटे कतार... 3000 की ओपीडी में मात्र 30 पर्ची क्यूआर से

आई.एच.एम.एस. पोर्टल से टोकन बनाने में नहीं हो रहा प्रसार

कैसे हटे कतार... 3000 की ओपीडी में मात्र 30 पर्ची क्यूआर से
क्यू आर कोड स्कैन की सुविधा पुरी तरह लागु नहीं हो पाई

कोटा। लोगों को अस्पतालों में लगने वाली लम्बी लम्बी कतारों व समय जल्दी इलाज उपलब्ध करवाने के लिये शुरू की गई क्यू आर कोड़ स्कैन की सुविधा का व्यापक प्रचार प्रसार नहीं होने से प्रभावी रूप से धरातल पर फायदेमन्द साबित नहीं हो पा रही है। संभाग के सबसे बडे अस्पताल में आज तक यह सुविधा पुरी तरह लागु नहीं हो पाई। जानकारी व प्रबल इच्छा शक्ति के चलते यह योजना लागु तो हुई लेकिन सिस्टम की उपेक्षा के चलते आगे बढ़ ही नहीं पाई।

जानकारी का अभाव बढ़ा रहा भीड़
अस्पतालों में ओपीडी पर्ची बनवाने के लिए शुरू की गई क्यूआर कोड स्कैन सुविधा धरातल पर दम तोड़ती नजर आ रही है। अस्पताल की में ओपीडी चिकित्सक को दिखाने आये पाटनपोल निवासी दिनेश शर्मा ने बताया कि मै यहां हर बार लाईन में लगता हूँ, कभी किसी स्टाफ ने बताया ही नहीं,आखिर हमारे जैसे लोकल लोगों को ही पता नहीं है तो बाहर से आने वालों को तो क्या जानकारी होगी। जयप्रकाश गौड़ ने कहा कि व्यापक प्रचार-प्रसार के अभाव और प्रशासनिक अनदेखी के कारण एमबीएस अस्पताल में यह सुविधा पूरी तरह निष्प्रभावी साबित हो रही है।

यहां 1 % बाहर 10 % से अधिक बना रहे टोकन
अस्पताल में रोजाना औसतन 3000 तक पर्चियाँ बनाई जाती है। लेकिन क्यूआर कोड के जरिए मात्र 30 से 40 लोग ही टोकन बनवा रहे है। दादाबाडी सीएचसी के प्रभारी डॉ. राजेश खंडेलवाल है कि इस काम के लिये एक आदमी अलग से लगा रखा है जो लोगों को जानकारी देने के साथ टोकन से पर्ची प्रिंट करने का काम कर रहा है। यहां रोजाना 400 से अधिक मरीज आ रहे है जिनमें से 50-60 लोग खुद अपना टोकन बना पा रहे है। वहीं सीएचसी कुन्हाडी की बात करें तो यहां पर रोजाना 600 सौ अधिक ओपीडी रहती है, जिनमें से 80 से 100 मरीज अपने मोबाईल से ही टोकन बनवा रहे है।

सामान्य कामों में ही उलझा रहता है पूछताछ केंद्र
अस्पताल के रिसेप्शन व पूछताछ केंद्र पर क्यूआर कोड या ऑनलाइन व्यवस्था की जानकारी देने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। स्थिति यह है कि पूछताछ केंद्र के कर्मियों को भी इस प्रणाली को संचालित करने की सही देने का समय ही नहीं मिल पाता। यदि कोई मरीज या तीमारदार अस्पताल के कोड या प्रक्रिया के बारे में पूछता है,तो उसे रिसेप्शन से कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिलता।

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पोर्टल होता है बार-बार ठप
राज्यभर के अस्पतालों को जोड़ने वाला 'इंटीग्रेटेड हेल्थ मैनेजमेंट सिस्टम' (कऌटर) पोर्टल खुद तकनीकी कमियों से जूझ रहा है। अस्पताल के सर्वररूम में कार्यरत लेखराज ने बताया की यहां 250 टुस्र२ की बीएसएनएल फाइबर स्पीड होने के बावजूद सर्वर पर लोड बढ़ते ही यह पोर्टल रोजाना 10 से 15 मिनट के लिए डाउन हो जाता है। सर्वर ठप होते ही कुछ ही मिनटों में पर्ची काउंटरों पर मरीजों की सैकड़ों मीटर लंबी लाइनें लग जाती हैं।
अस्पताल में ज्यादातर मरीज बाहर से आते है। ऐसे में वह सीधे ही काउन्टरों की लाईन में लग जाते है। जिले में काफी ज्यादा व्यक्ति ऑनलाईन हो चुके हे,लेकिन इस सुविधा का प्रयोग कम ही करते है। योजना का प्रचार व उपयोग करने के लिये हमारे यहां मेन एंट्री पर ही योजना से सम्बन्धित क्यू आर कोड़ स्कैनर लगा रखे है।
-डॉ. कर्नेश गोयल उपअधीक्षक एमबीएस अस्पताल कोटा

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 हमारे स्टाफ द्वारा यहां आने वाले प्रत्येक मरीज को पर्ची बनाने के बाद ऑनलाईन टोकन बनाने के तरीके भी बतायें जाते है, उन्हें बताया जाता है कि इससे आपका समय बचेगा साथ ही अस्पताल में कतारें कम लगती है।
-डॉ. चन्द्रप्रकाश कलवार स्पे. क्रिटीकल केयर एवं प्रभारी सीएचसी कुन्हाडी

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