कागज से धरातल तक आने में ही कई गुना बढ़ रही प्रोजेक्ट कॉस्ट
भारत में भी चीन की तर्ज पर तैयार हों प्रोजेक्ट
प्रोजेक्ट की डेड लाइन के कोई मायने ही नहीं, बढ़ता रहता है समय और बजट।
कोटा। केस एक: नई धानमंडी स्थित थोक फल सब्जीमंडी को यहां से चंद्रेसल में शिफ्ट करने की योजना तत्कालीन भाजपा सरकार के समय में बनी थी। 23 साल बीतने के बाद भी अभी तक यह योजना प्रक्रियाओं के चलते अधरझूल में ही अटकी है। इससे उस समय इसके लिए तय किए गए बजट में तीन गुना तक बढ़ोतरी हो चुकी है।
केस दो: कलक्ट्रेट स्थित जिला न्यायालय का भवन समय के साथ छोटा पडने लगा है। इसे स्वास्थ्य भवन के पास सार्वजनिक निर्माण विभाग की जमीन पर तैयार करने के लिए जमीन आवंटित हो गई थी। उस समय इसके लिए करीब 200 करोड़ का बजट तय किया गया था। लेकिन अभी तक प्रक्रियाओं में ही उलझने के कारण न तो जगह तय हो सकी है और न ही इसके बनने की समय सीमा। हालत यह है कि इसका बजट अब 290 करोड़ हो गया है।
केस तीन: कोटा बैराज समेत तीन बांधों की मरम्मत करवाने की योजना बनी। करीब 10 से 15 साल पहले मरम्मत के लिए करीब 100 करोड़ रुपए का बजट तय किया गया था। वर्तमान में यह बजट दो गुना से भी अधिक 236 करोड़ रुपए हो गया है। लेकिन अभी तक भी मरम्मत के संबंध में कोई ठोस निर्णय या कार्यवाही नहीं हो सकी है।
यह तो कुछ उदाहरण हैं । ऐसी छोटी बड़ी कई योजनाएं हैं जिनकी बजट तक में घोषणा हो जाती है। बजट दो से दस गुना तक बढ़ जाता है लेकिन योजना धरातल पर नहीं आ पाती। दूसरी तरह चीन जैसे देश में ऐसे प्रोजेक्ट ना केवल समय पर तैयार हो जाते हैं अपितु डेढ लाइन से छह माह पूर्व तैयार कर लिया जाता है। ऐसा छोटी मोटी योजनाओं में ही नहीं अपितु बुलेट ट्रेन चलाने जैसी योजनाओं में देखा जा चुका है।चीन को दुनिया में तेजी से और समय से पहले प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए जाना जाता है।
यह कर दिखाया चीन ने
- हुओशेनशान अस्पताल (वुहान) कोरोना महामारी के दौरान 1000 बेड का अस्पताल तय समय से 10 दिन पहले तैयार कर दिया।
- बीजिंग-शंघाई हाई-स्पीड रेल लाइन। 1318 किमी निर्धारित समय से पहले पूरा। यह दुनिया की सबसे व्यस्त हाई-स्पीड रेल लाइनों में से एक।
-बीजिंग डाक्सिंग इंटरनेशनल एयरपोर्ट दुनिया के सबसे बड़े एयरपोर्ट्स में शामिल, पूरी तरह हाई-टेक और आॅटोमेटेड सिस्टम के बावजूद 2019 में तय समय से पहले उद्घाटन।
- थ्री गॉर्जेस डैम चीन की ऊर्जा जरूरतों की रीढ़ दुनिया का सबसे बड़ा जलविद्युत बांध। कई यूनिट पहले ही चालू कर दी गईं।
मिनी सचिवालय की भी यही हालत
संभागीय मुख्यालय होने के बावजूद भी अभी तक कोटा में मिनी सचिवालय नहीं है। कोटा में मिनी सचिवालय बनाने का प्रोजेक्ट कांग्रेस सरकार के समय में बना। योजना धरातल पर उतरती उससे पहले ही सरकार बदल गई। प्रोजेक्ट अब एक कदम भी आगे नहीं बढ़ रहा है ।
कंवेंशन सेंटर का तो प्रोजेक्ट ही निरस्त
कोटा के दशहरा मैदान स्थित फेज दो में दिल्ली के भारत मंडपम् के तर्ज पर कंवेंशन सेंटर बनाने की योजना थी। पहले इस पर करीब 400 करोड़ रुपए खर्च होने थे। बाद में दूसरी बार योजना बदली और बजट आधा कर 200 करोड़ रुपए कर दिया गया। समय इतना अधिक लगा कि योजना को मूर्त रूप लेने की जगह आखिरकार निरस्त ही करना पड़ा।
स्मार्ट सिटी के भी कई प्रोजेक्ट हुए निरस्त
इतना ही नहीं तत्कालीन भाजपा सरकार के समय में कोटा में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत बस स्टॉप समेत अन्य कार्य करवाने की योजनाएं बनी। उन पर काम भी हुआ लेकिन सरकार बदलने के बाद आधी से अधिक योजनाएं निरस्त करनी पड़ी और कई में बजट बढ़ गया। ऐसे कई योजनाएं हैं जो धरातल पर आने से पहले ही न तो समय पर पूरी हो पा रही हैं और उनका बजट भी कई गुना अधिक बढ़ रहा है। जिससे आमजन को उनका लाभ तक नहीं मिल पा रहा।
समय पर हो योजनाएं पूरी, जनता पर नहीं पड़े भार
तलवंडी निवासी महेश शर्मा का कहना है कि सरकार द्वारा कई बार लोगों की डिमांड पर घोषणा तो कर दी जाती है। उसके बाद योजना भी बन जाती है। लेकिन उन योजनाओं को लागू व विभिन्न स्तरों पर स्वीकृतियों में ही इतना अधिक समय लग जाता है कि उस योजना का बजट कई गुना बढ़ जाता है। जिसका आर्थिक भार जनता पर ही पड़ता है। महावीर नगर निवासी नितिन नामा का कहना है कि योजनाएं आमजन के लिए लाभकारी और कम बजट की होनी चाहिए। साथ ही उन्हें समय पर पूरा किया जाए। जबकि विदेशों में तरक्की करने का कारण ही यह है कि वहां कम बजट में और समय पर योजनाएं पूरी होती है। जिससे जनता को उनका लाभ मिल पाता है।
इनका कहना है
योजनाएं सरकार के स्तर पर बनती है। उनकी प्रक्रियाएं पूरी होने के बाद निविदा जारी की जाती है। निविदा व टेंडर जारी होने के बाद उसमें जितना भी समय लगता है उसके बाद बजट बढ़े या कम हो उसके लिए संवेदक फर्म ही जिम्मेदार रहती है। योजनाओं की स्वीकृति में समय लगना सरकार के स्तर पर ही रहता है। एक बार योजना बनने के बाद उसमें बदलाव होने पर ही बजट बढ़ता है।
- सुनील गर्ग, अध्यक्ष, पीडब्यूडी कांंट्रेक्टर एसोसिएशन
जब तक निविदा जारी नहीं होती तब तक वह योजना धरातल पर नहीं आती। निविदा जारी होने व कायार्देश जारी होने के बाद स्वीकृतियों में समय लगने से यदि बजट बढ़ता है तो उसका जनता पर भार नहीं पड़ता है। कई योजनाएं तो निविदा जारी होने से पहले ही बदलती रहती हैं। उस बारे में सरकार के स्तर पर ही कुछ कहा जा सकता है।
- ए.क्यू कुरैशी, एक्सईएन, नगर निगम कोटा
सरकार व प्रशासन की मंशा तो रहती है कि जो भी प्रोजेक्ट बनाए जाएं समय पर पूरा किया जाए। लेकिन कई बार जमीन आवंटन, बजट आवंटन, अन्य प्रक्रियाओं को पूरा करने में सरकार के स्तर पर ही समय अधिक लग जाता है। जिससे कई बार कुछ प्रोजेक्ट में देरी हो सकती है। लेकिन हर प्रोजेक्ट बनते समय ही उसकी समय सीमा तय करने से उसकी लागत भी सीमित रहती है और जिस उद्देश्य से प्रोजेक्ट बनाया गया है उसका लाभ भी लोगों को मिल पाता है। विदेशों में ऐसा हो रहा है तो यहां भी उससे सीख लेते हुए कार्य किए जाने चाहिए।
- कृष्णा शुक्ला, अतिरिक्त जिला कलक्टर, प्रशासन

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