सुअर की किडनी के सहारे 271 दिनों तक जिंदा रहा इंसान: मेडिकल साइंस का चमत्कार, लाखों मरीजों के लिए नई उम्मीद
दुनिया भर के लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण
वॉशिंगटन। मेडिकल साइंस के इतिहास में एक ऐसा अभूतपूर्व चमत्कार हुआ है जिसने किडनी की बीमारी और अंगों की किल्लत से जूझ रहे दुनिया भर के लाखों मरीजों के लिए उम्मीद की नई किरण जगा दी है। अमेरिका में 66 वर्षीय टिम एंड्रयूज नाम के एक मरीज को सुअर की किडनी के सराहे 9 महीनों तक जिंदा रखा गया। उस मरीज को आनुवंशिक रूप से संशोधित सुअर की किडनी के सहारे पूरे 9 महीने यानी 271 दिनों तक बिना डायलिसिस के जिंदा रखा गया। महत्वपूर्ण बात ये है कि इस दौरान वो सामान्य जिंदगी जीए और जब इसके बाद उन्हें इंसानों वाला किडनी लगा दिया गया। यह अभी तक के मेडिकल इतिहास में अब तक का सबसे लंबा समय है जब किसी जानवर का अंग किसी इंसान के शरीर में इतने लंबे वक्त तक सफलतापूर्वक काम करता रहा। द लांसेट जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि सबसे खास बात यह रही कि सुअर की किडनी ने एक ब्रिज यानि अस्थायी सहारे के रूप में काम किया। 9 महीने बाद जब टिम को एक इंसानी डोनर की किडनी मिली तब उनके शरीर ने उसे भी बिना किसी एंटीबॉडी रिजेक्शन के तुरंत स्वीकार कर लिया।
सुअर की किडनी से 9 महीने जिया इंसान
हार्वर्ड मेडिकल स्कूल, मैसाचुसेट्स जनरल हॉस्पिटल और उससे जुड़े अस्पतालों के एंड्रयूज के डॉक्टरों ने उनके अनुभव के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने बताया कि कैसे जेनोट्रांसप्लांटेशन यानि जानवर से इंसान में अंग प्रत्यारोपण ने एंड-स्टेज किडनी फेलियर होने के बाद अगर डोनर ना मिले तो वैकल्पिक तौर पर सुअर की किडनी से कुछ महीने तक इंसान को जिंदा रखा जा सकता है। यह मामला भारत के लिए खास तौर पर अहम है जहां हर साल लगभग दो लाख नए मरीजों को गुर्दे की जरूरत होती है लेकिन सिर्फ 14,500 के आसपास ही ट्रांसप्लांट हो पाते हैं। पुणे के सीनियर यूरोसर्जन डॉ. संजय कुलकर्णी ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा यहां सबसे अहम बात यह है कि सुअर के गुर्दे ने लगभग नौ महीनों तक डायलिसिस-मुक्त किडनी फंक्शन दिया और मानव गुर्दा मिलने तक एक पुल (ब्रिज) का काम किया।
सुअर की किडनी से 9 महीने ब्रिज ट्रांसप्लांट
उन्होंने कहा कि मरीज एंड्रयूज को USFDA की 'एक्सपेंडेड एक्सेस इन्वेस्टिगेशनल न्यू ड्रग' एप्लीकेशन के तहत सुअर की किडनी मिली। यह एप्लीकेशन अक्सर उन मरीजों की मदद के लिए मंजूर की जाती है जिनकी जान को खतरा हो और जिन्हें एक्सपेरिमेंटल इलाज की ज़रूरत हो। मंजूरी मिलने के बाद उनकी किडनी के काम करने की क्षमता, शरीर द्वारा उसे अस्वीकार करने, एंटी-बॉडी रिस्पॉन्स और सुअर से इंसान में संक्रमण फैलने के खतरे की निगरानी की गई। ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद ही सुअर की किडनी ने काम करना शुरू कर दिया। 14वें दिन एक शुरुआती चेतावनी मिली जब शरीर की इम्यून T-सेल्स ने किडनी पर हमला करना शुरू कर दिया लेकिन डॉक्टरों ने रिजेक्शन को कंट्रोल कर लिया और सुअर से कोई पैथोजन नहीं फैला। करीब 9 महीने तक किडनी ने अच्छा काम किया। इसके बाद एंड्रयूज को एक मृत व्यक्ति की किडनी दी गई जिसने ट्रांसप्लांट के तुरंत बाद ही काम करना शुरू कर दिया। इससे साबित हुआ भविष्य में सुअर की किडनी से लाखों लोगों की जान बच सकती है।

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