RSS का बड़ा जनसंपर्क अभियान: देशभर में 10.19 करोड़ परिवारों तक पहुंचा संघ, मोहन भागवत ने दी जानकारी
'पंच परिवर्तन' अपनाने का आह्वान
नागपुर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि अपने शताब्दी वर्ष जनसंपर्क अभियान के तहत संघ देश भर में 10 करोड़ से अधिक परिवारों तक पहुंचा है। नागपुर में संघ मुख्यालय में आयोजित वार्षिक विजयादशमी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि संगठन ने 4,61,527 गांवों और 41,000 शहरी बस्तियों के कुल 10,19,88,511 परिवारों तक अपनी पहुंच बनाई है।
भागवत ने बताया कि शताब्दी अभियान के तहत विदेशों में भी संपर्क कार्यक्रम चलाए गए, जिनका उद्देश्य भारत, हिंदू समाज और आरएसएस के बारे में सटीक जानकारी देना था। कार्यकर्ताओं ने हिंदू समाज के समावेशी स्वरूप, भारत की सनातन सांस्कृतिक परंपराओं और संघ के उद्देश्यों और गतिविधियों को प्रमुखता से सामने रखा। उन्होंने कहा कि वैश्विक मंच पर भारत के मजबूत होते कद के साथ ही दुनिया भर में देश के प्रति रुचि बढ़ रही है।
दुनिया के कई देश भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और बेलगाम उपभोग से पैदा हो रही समस्याओं से जूझ रहे हैं, जिनमें पारिवारिक जीवन का बिखरना और युवा पीढ़ी में नैतिक मूल्यों का ह्रास शामिल है। संघ प्रमुख ने कहा कि आज पूरी दुनिया बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता, पर्यावरणीय संकट और वर्चस्व की होड़ से उपजे संघर्षों का सामना कर रही है। उन्होंने कहा कि भारत के पास इन कई चुनौतियों का समाधान मौजूद है, यही वजह है कि इसके दृष्टिकोण को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्सुकता बढ़ी है।
भागवत ने कहा कि शताब्दी वर्ष में शुरू हुआ यह जनसंपर्क और संवाद आगे भी जारी रहेगा। कार्यकर्ता इस जुड़ाव को बनाए रखने और इसका विस्तार करने के रास्ते तलाश रहे हैं। आरएसएस की 'पंच परिवर्तन' पहल पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि पारिवारिक प्रबोधन, नागरिक अनुशासन और पर्यावरण संरक्षण जैसे विषयों को व्यापक स्वीकार्यता मिल रही है, क्योंकि दुनिया भर के लोग उन्हीं समस्याओं को झेल रहे हैं, जिनका समाधान ये उपाय प्रस्तुत करते हैं।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि इस पहल को केवल एक वर्ष के कार्यक्रम के रूप में न देखा जाए, बल्कि इसे लगातार आचरण और आदतों में ढालकर रोजमर्रा के जीवन में शामिल किया जाए। भागवत ने चिंता जताई कि संस्कार देने की परंपरा, जो पहले परिवार, विद्यालय और सामाजिक माहौल से मिलती थी, अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रही है। उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया के इस दौर में जहां हर जानकारी उंगलियों पर उपलब्ध है, वहां सही और गलत सामग्री के बीच फर्क करने की समझ होना बेहद जरूरी हो गया है।
उन्होंने कहा कि सूचना विवेकशील व्यक्ति के लिए लाभदायक हो सकती है, लेकिन विवेकहीन व्यक्ति के लिए यही नुकसानदेह साबित होती है। उन्होंने कहा कि सरकार और समाज को ओटीटी सेवाओं सहित सूचना साझा करने वाले मंचों के लिए उचित नियमों और अनुशासन पर विचार करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि परिवारों और समाज को भी अपनी नई पीढ़ी को सही-गलत का भेद करने और समझदारी से विकल्प चुनने की सीख देनी होगी। नशे की बढ़ती लत को गंभीर समस्या बताते हुए भागवत ने कहा कि केवल इसके दुष्प्रभावों की जानकारी होना ही लोगों को इस दलदल में फंसने से नहीं रोक पा रहा है।
उन्होंने युवा पीढ़ी को बचाने के लिए सरकार, प्रशासन और समाज, खासकर अभिभावकों से समय रहते ठोस कदम उठाने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि आरएसएस के स्वयंसेवक नशामुक्ति के काम में पहले से जुटे लोगों और संगठनों के साथ मिलकर एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान चलाने का प्रयास करेंगे। भागवत ने कहा कि भारत को 'विश्वगुरु' बनाने की जिम्मेदारी अंततः युवा पीढ़ी के कंधों पर ही होगी, जिसे शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ रहने के साथ-साथ अपने लक्ष्यों और जीवन के उद्देश्य को समझना होगा।
उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति को न तो रोका जा सकता है और न ही रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह अनेक लाभ देती है और ज्ञान व तर्क के जरिए आचरण को सुधारने में मदद करती है। तकनीक हालांकि केवल एक माध्यम है और इसका प्रभाव इसका उपयोग करने वालों की समझ पर निर्भर करता है। उन्होंने आगाह किया कि केवल भौतिकवादी और उपभोगवादी सोच सुविधाओं और आराम में बढ़ोतरी के बावजूद भारी नुकसान पहुंचा सकती है, जो मानव निर्मित और प्राकृतिक आपदाओं की भी बड़ी वजह बनती है।

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