जानें राज काज में क्या है खास
नजरें पांच बत्ती की ओर
मोटा-पतला और पर्ची :
सूबे में तीन दिन से मोटा-पतला और पर्ची को लेकर चर्चा जोरों पर है। चर्चा भी सोमनाथ की नगरी से शुरू होकर सचिवालय तक पहुंच गई। पर्ची को लेकर और कोई अपना मुंह खोलता तो इतनी चर्चा नहीं होती, लेकिन मीनेश वंशज डॉक्टर साहब ने बेधड़क होकर अपने मन की बात बोली, तो चर्चा होना लाजिमी है। राज का काज करने वाले भी लंच केबिन में बतियाते हैं कि डॉक्टर साहब के मुंह से सच ही बाहर आया है, चूंकि कई धुरंधरों को पर्ची ने दौड़ से बाहर कर दिया, जो बेचारे दुबले हो गए। उनके चेहरों पर झुर्रियां साफ दिखाई देने लगी हैं। और तो और अंधेरे में आंसू भी बहाते हैं। उनका वजन भी 20 किलो तक कम हो गया। चौड़ी छाती वाले डॉक्टर साहब की मन की बात को समझने वाले समझ गए, ना समझे वो अनाड़ी है।
मेवा को लेकर फिर हलचल :
सूबे में बॉर्डर डिस्ट्रिक्क से ताल्लुक रखने वाले सिंह राशि वाले साहब को लेकर सूबे में एक बार फिर हलचल मची हुई है। हलचल मचे भी क्यों नहीं, शिलाजीत और मेवा खाने वाले राम जी भाई साहब की पर्सनलिटी ही ऐसी है। हलचल भी और किसी में नहीं बल्कि उनकी ही हाथ वाली पार्टी के लोगों में मची हुई है। भाई साहब भी छुपे हुए नहीं है, बल्कि बोर्डर डिस्ट्रिक्ट का बच्चे-बच्चे की जुबान पर है। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि विरोध कर रहे हाथ वाले भाई लोग उनकी पर्सनलिटी के पासंग में भी नहीं हैं, सो होर्डिंग एंड बैनर का सहारा लेकर ही अपनी भड़ास निकालने के अलावा उनके पास कोई चारा भी तो नहीं है। अब भाई साहब भी उन बेचारों को देख कर मंद मंद मुस्कराते हैं और चुपचाप रास्ता बदल कर निकलने में ही अपनी भलाई समझते हैं।
नजरें पांच बत्ती की ओर :
सूबे में भगवा वाले कई भाई लोगों की इन दिनों पांच बत्ती के पास बने बड़े ठिकाने की ओर नजरें कुछ ज्यादा ही टिकी हैं। बेचारों को दिन-रात यह ठिकाना ही दिखता है। वैसे तो ठिकाने को देखने का उनको शौक नहीं है, बल्कि उनकी मजबूरी बन गई है। सरदार पटेल मार्ग पर स्थित बंगला नंबर 51 में बने भगवा वाले ठिकाने पर भी इस बंगले की चर्चा हुए बिना नहीं रहती। चूंकि इस ठिकाने से निकलने वाली पर्ची ही काम की होती है, बाकी सारी मेहनत बेकार ही निकलती है। जब से भर्ती वाले महकमें में अपॉइंटमेंट हुए हैं, तब से लाइन में लगे भाई लोगों का इस ठिकाने पर भरोसा भी बढ़ गया है। लेकिन ठिकाने के ठिकानेदार भी कम नहीं हैं, तीन दशक तक वंशावली खंगालने के बाद ही पर्ची बनाते हैं, बाकी तो चिंतन-मंथन और बैठक में ही टाइम पास करते हैं।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि रैफरी को लेकर है। रैफरी भी और किसी दल का नहीं बल्कि 140 साल पुरानी हाथ वाली पार्टी का है। इंदिरा गांधी भवन में बने हाथ वालों के ठिकाने पर भी हार्डकोर वर्कर्स में रोजाना इस जुमले की चर्चा हुए बिना नहीं रहती। जुमला है कि इस पार्टी में रैफरी बनने के लिए कई भाई लोग हाथ-पैर मार रहे हैं, लेकिन उनकी पार पडते नजर नहीं आ रही। चूंकि जब तक जोधपुर वाले भाई साहब रैफरी बने हुए है, तब तक सपने देखना बेकार है। भाई साहब अपनी जादूगरी से फैसला बदलने की सोचने वालों का मन ही बदलने में माहिर हैं, नहीं मानों तो अब तक का पिछला इतिहास खंगाल कर देख लो।
-एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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