राज काज में क्या है खास, जानें
जब खाकी को चोटें गिननी पड़ीं
वोटर और अफवाहों की दौड़ :
सूबे में इन दिनों वोटर और अफवाहों की दौड़ काफी चर्चा में है। हो भी क्यों न, मामला सरपंची से जो ताल्लुक रखता है। चर्चा है कि सरपंच की कुर्सी में आखिर ऐसा कौन-सा चुंबक लगा है कि मतपेटी से लेकर पुलिस की वर्दी तक सब खिंचे चले आ रहे हैं। इस बार सरपंच की कुर्सी के लिए ऐसा संग्राम हो रहा है, जैसे सीएम की शपथ हो। सपने देखने वाले गलत भी नहीं हैं, चूंकि सूबे में सरपंच साहब सीएम की कुर्सी तक पहुंच चुके हैं। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि अब गांव में हार-जीत का फैसला मतगणना से होगा या अफवाहों की पंचायत से, यह अलग सवाल है।
चर्चा में चुनाव का नया फार्मूला :
सूबे में इस बार चुनाव का नया फार्मूला सामने क्या आ गया, राज के काज की पोल खोल गया। नया फार्मूला भी छोटा-मोटा नहीं बल्कि पर्चा खारिज होने के बाद चुनाव चिन्ह हासिल करने के बाद जीत का प्रमाण पत्र तैयार होने से जुड़ा हुआ है। अब यह तो इलेक्शन कमीशन की जांच बताएगी कि यह लोकतंत्र का चमत्कार है या कागजों का कमाल। राज का काज करने वालों में चर्चा है कि बोर्डर डिस्ट्रिक्क की ग्राम पंचायत के विलेज हेड के इलेक्शन में हुए इस कारनामे के बाद अब नियमों की किताब भी शायद अपना पन्ना पलटने में जुट गई। जिस उम्मीदवार का नामांकन खारिज हो चुका था, उसे चुनाव चिन्ह भी आवंटित हुआ और वह मैदान में भी उतर गया और जीत भी घोषित हो गई। पब्लिक ने भी कई तरह के सवाल उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। सो पब्लिक के सवाल अब चुनावी गलियारों में खूब गूंज रहे हैं।
जब खाकी को चोटें गिननी पड़ीं :
मत्स्य जिले की एक पंचायत में सरपंच चुनाव के नतीजों को लेकर 319 वोटों के अंतर के हिसाब ऐूसा बिगड गया कि पुलिस को चोटें गिननी पड गई। अब चुनाव हारने वाला पक्ष वोटों का हिसाब मांग रहा है और पुलिस अपने घावों का। दोनों दलों के ठिकानों पर हार्ड कोर वर्कर्स भी चुटकी ले रहे हैं कि 319 वोटों का हिसाब इतना भारी पड़ा कि पुलिस को मतों के साथ चोटों का भी हिसाब रखना पड़ गया। सरपंच की कुर्सी जीतनी थी, थाने का चक्कर नहीं।
बाबुओं की बढ़ीं धड़कनें :
सूबे में इन दिनों सरकारी बाबुओं की धड़कनें बढ़ी हुई हंै। धड़कने बढने का कारण और कोई नहीं बल्कि राज की ओर से 15 तारीख तक पदोन्नति का फरमान है। वैसे तो सरकारी दफ्तरों में पदोन्नति की फाइलें कभी-कभी इतनी लंबी यात्रा पर निकलती हैं कि कर्मचारी की उम्मीद रिटायरमेंट के स्टेशन पर पहुंच जाती है। अब राज के फरमान से कर्मचारियों के चेहरे तो खिल गए, लेकिन उनको डर है कि कही डीपीसी की बैठक में कोई बाबू यह न कह दे कि साहब पदोन्नति की फाइल तो तैयार है, बस अगली बैठक में रखेंगे।
एक जुमला यह भी :
सूबे में इन दिनों एक जुमला जोरों पर है। जुमला भी छोटा-मोटा नहीं, बल्कि राज का काज करने वालों की वेतन की फाइल से ताल्लुक रखता है। जुमला है कि सरकारी दफ्तरों में तारीखों का भी अपना भाग्य होता है। आम आदमी की तारीख निकल जाए तो काम अटक जाता है, लेकिन सरकारी फाइल की तारीख बढ़ जाए, तो उसे नई जिन्दगी मिल जाती है। अब देखो न, सूबे में राज का काज करने वालों की तनख्वाह तय करने की सीमा दो महीने क्या बढा दी, दफ्तरों में नई चर्चा चालू हो गई।
- एल. एल. शर्मा
(यह लेखक के अपने विचार हैं)

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