खबर छपी तो थमी जेसीबी : पहाड़ियों में सन्नाटा, अब स्थायी रोक की चुनौती
नवज्योति की ग्राउंड रिपोर्ट के बाद हरकत में आया खनिज विभाग
अजमेर। अजमेर-पुष्कर मार्ग के खरेखड़ी क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों को अवैध खनन से छलनी करने का मामला उजागर होते ही सोमवार को तस्वीर बदली नजर आई। जिन पहाड़ियों में जेसीबी और ट्रैक्टरों का शोर गूंजने की शिकायतें थीं, वहां सन्नाटा पसरा रहा। दैनिक नवज्योति की ग्राउंड रिपोर्ट प्रकाशित होने के बाद खनिज विभाग हरकत में आया और उसकी टीम ने क्षेत्र का निरीक्षण किया। खनन करने वाले भी सतर्क हो गए। हालांकि एक दिन की खामोशी से अवैध खनन पर स्थायी रोक का दावा नहीं किया जा सकता।
नवज्योति ने सोमवार के अंक में तस्वीरों सहित खुलासा किया था कि खरेखड़ी में एक भी खनन लाइसेंस जारी नहीं होने के बावजूद पहाड़ियों के बड़े हिस्से काट दिए गए। दिन-रात खनन और अवैध ब्लास्टिंग की शिकायतें भी सामने आई थीं। अब सवाल यह है कि बिना लाइसेंस पहाड़ कटते रहे तो जिम्मेदार विभागों की निगरानी कहां थी?
अवैध खनन रोकना खनिज विभाग का काम, जवाबदेह दूसरे विभागों की भी : खनिज अभियंता सत्यनारायण कुमावत ने स्पष्ट किया कि अवैध खनन रोकना खनिज विभाग की जिम्मेदारी है, लेकिन खरेखड़ी में वन विभाग, अजमेर विकास प्राधिकरण और पंचायत से संबंधित भूमि भी है। विभाग ने पिछले एक साल में जिले में 130 कार्रवाई कर 28 मुकदमे दर्ज कराए हैं। अब खनन के मूल स्रोत और इसमें शामिल लोगों तक पहुंचकर सीधे पुलिस कार्रवाई तथा मुकदमे दर्ज कराने पर जोर दिया जा रहा है।
संयुक्त कमेटी भी नहीं रोक सकी पहाड़ों की कटाई : नवज्योति ने सवाल उठाया कि जब खरेखड़ी में खनन का कोई लाइसेंस ही नहीं है तो जमीन की श्रेणी चाहे जो हो, अवैध खनन पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लग सकी? कुमावत ने बताया कि पूर्व में संबंधित विभागों की संयुक्त समिति बनाकर कार्रवाई की गई, लेकिन खनन पूरी तरह नहीं रुका।
पहाड़ कटे तो बिगड़ेगा पानी का प्राकृतिक रास्ता : अरावली की पहाड़ियों की अंधाधुंध कटाई केवल पर्यावरण ही नहीं, अजमेर की प्राकृतिक जल निकासी के लिए भी खतरा है। पहाड़ों का स्वरूप बदलने और प्राकृतिक नालों में मलबा डालने से बारिश में जलभराव और मिट्टी के कटाव का जोखिम बढ़ सकता है।
एनजीटी की सख्ती के बाद भी निगरानी पर सवाल : सितंबर 2026 में नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने अरावली क्षेत्र में अवैध खनन रोकने के लिए नियमों की पालना और जिला स्तरीय समितियों के औचक निरीक्षण पर जोर दिया था। इसके बावजूद खरेखड़ी में पहाड़ों की कटाई ने निगरानी की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

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