निकाय चुनाव निपटे, अब बागियों की बारी! भाजपा-कांग्रेस में मंथन तेज, अनुशासन तोड़ने वालों पर कार्रवाई का इंतजार
पंचायत चुनाव से पहले भीतरघात की चिंता
जयपुर। निकाय चुनाव का शोर थम गया, नतीजे भी सामने आ गए, लेकिन भाजपा और कांग्रेस में बागियों को लेकर सियासी गर्मी अभी बरकरार है। टिकट नहीं मिलने से नाराज होकर अपनी ही पार्टी के अधिकृत प्रत्याशियों के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे नेताओं पर अब कार्रवाई की तलवार लटक रही है। दोनों दलों के कार्यकर्ताओं की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संगठन बागियों के खिलाफ क्या कदम उठाता है।
निकाय चुनाव में टिकट वितरण के बाद भाजपा और कांग्रेस दोनों में असंतोष खुलकर सामने आया था। कई टिकट दावेदारों ने पार्टी के फैसले को स्वीकार करने के बजाय निर्दलीय या दूसरे प्रत्याशियों के रूप में मैदान में उतरकर अधिकृत उम्मीदवारों को चुनौती दी। इससे कई वार्डों में मुकाबला त्रिकोणीय हुआ और पार्टी प्रत्याशियों के चुनावी समीकरण बिगड़े।
अब एक्शन का इंतजार : चुनावी परिणाम सामने आने के बाद जीतने वाले खेमों में जश्न है तो हारने वाले प्रत्याशियों और उनके समर्थकों में बगावत को लेकर मंथन चल रहा है। कार्यकर्ताओं का सवाल है कि पार्टी के खिलाफ चुनाव लड़ने वालों पर संगठन कब और क्या कार्रवाई करेगा। खासतौर पर वे प्रत्याशी और समर्थक कार्रवाई की मांग कर रहे हैं, जिन्हें बागियों के कारण नुकसान उठाना पड़ा।
पंचायत चुनाव से पहले बागियों की फिक्र : अब नजर आगामी पंचायतराज चुनावों पर है। कार्यकर्ताओं को आशंका है कि यदि निकाय चुनाव में बगावत करने वालों पर कार्रवाई नहीं हुई तो पंचायत चुनाव में टिकट वितरण के बाद भी यही कहानी दोहराई जा सकती है। टिकट के दावेदारों की लंबी कतार के बीच संगठन के सामने बगावत रोकने और कार्यकर्ताओं में भरोसा बनाए रखने की चुनौती होगी।
कार्रवाई हुई तो संदेश, नहीं हुई तो सवाल :
राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा और कांग्रेस बागियों को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। कार्रवाई होती है तो इसे संगठनात्मक अनुशासन का संदेश माना जाएगा, जबकि कार्रवाई टलती है तो कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल बना रहेगा कि पार्टी विरोधी गतिविधियों के खिलाफ संगठन की नीति आखिर क्या है। निकाय चुनाव का परिणाम भले ही घोषित हो चुका हो, लेकिन बागियों पर कार्रवाई का फैसला अब दोनों दलों के लिए अगली सियासी परीक्षा बन गया है।

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