राजस्थान के रंगमंच को चाहिए स्थायी सहारा : दर्शक तैयार, लेकिन मंच तक पहुंच आसान नहीं
अब सुलभ ऑडिटोरियम और सम्मानजनक आजीविका की दरकार
जयपुर। प्रदेश के रंगकर्मी पूरी निष्ठा से मंच सजा रहे हैं। दर्शकों की रुचि पहले से बढ़ी है और टीवी व ओटीटी ने कलाकारों के लिए नए रास्ते खोले हैं। इसके बावजूद रंगमंच से जुड़े लोगों का मानना है कि सामूहिक प्रयास, सुलभ ऑडिटोरियम और आर्थिक सहारे के बिना यह कला पूरी ताकत से नहीं पनप सकती। रंगमंच की मौजूदा स्थिति को लेकर नवज्योति ने कलाकारों से जानकारी जुटाई, जिसमें इनकी राय है कि ऑडियंस की कमी नहीं है। लोग अच्छा नाटक देखना चाहते हैं और पहले की तुलना में ज्यादा रुचि दिखा रहे हैं।
कभी जयपुर में रवींद्र मंच ही रंगमंच-गतिविधियों का केंद्र था। अब जवाहर कला केंद्र और राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर जैसे कई स्थान उपलब्ध हैं। सवाल यह है कि क्या ये स्थान आम रंगकर्मी और छोटी थिएटर ग्रुप्स को आसान शर्तों और उचित रेट पर मिल पा रहे हैं।
आजीविका की चुनौती और युवाओं के लिए नए अवसर :
कलाकारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आजिविका की है। रंगमंच लंबे समय से ऐसे रंगकर्मियों के भरोसे चलता आया है, जो रोजी-रोटी के लिए दूसरा काम करते हैं और समय निकालकर मंच पर आते हैं। थिएटर फेस्टिवल, इन-हाउस प्रोडक्शन और थिएटर ग्रुप्स के लिए पर्याप्त बजट न होने से नियमित आय का साधन नहीं बन पाता। आज का युवा थिएटर में करियर बनाना चाहता है। राजस्थान में थिएटर के दर्शक कम नहीं हुए हैं। कलाकारों के मुताबिक लोग अब पहले से ज्यादा अच्छा नाटक देखना चाहते हैं।
उज्ज्वल प्रकाश मिश्र (युवा रंगकर्मी)
रवींद्र मंच के साथ अब जेकेके और राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर जैसे कई आॅडिटोरियम हैं। कलाकार चाहते हैं कि लोकल ग्रुप्स को यहां प्राथमिकता मिले।
नरेंद्र गुप्ता (एक्टर)
रवींद्र मंच आज जर्जर इमारत के कारण चर्चा में है। इसका रेनोवेशन जल्द हो और काम कलाकारों की कमेटी के साथ मिलकर किया जाए, ताकि मंच फिर नियमित नाटकों से गुलजार हो।
रवि झांकल (वरिष्ठ रंगकर्मी-अभिनेता)
आजीविका की चुनौती
रंगकर्मियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक है। थिएटर फेस्टिवल सहित अन्य से नियमित आय नहीं बन पाती, इसलिए कई कलाकारों को दूसरा काम करना पड़ता है।
रुचि भार्गव (वरिष्ठ नाट्य निर्देशिका)
रेपर्टरी कंपनी की उम्मीद
दिल्ली की एनएसडी रेपर्टरी और श्रीराम रेपर्टरी की तर्ज पर राजस्थान में प्रोफेशनल रेपर्टरी कंपनी बनाने की उम्मीद जताई गई है। कलाकारों का कहना है कि नियमित मानदेय मिले तो उन्हें दूसरे काम पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा और अच्छे नाटकों का सिलसिला बढ़ेगा।
संजय विद्रोही (महासचिव, राजस्थान इप्टा)
युवा थिएटर के साथ फिल्म, टीवी और ओटीटी की ओर भी बढ़ रहे हैं। पहले रंगमंच से खुद को ट्रेन करें, फिर बाकी माध्यम अपनाएं। प्लेराइटिंग वर्कशॉप से ऐसे नाटक भी निकलेंगे, जो दर्शकों के सुख-दुख और परंपराओं से जुड़े हों।
बीएम व्यास (वरिष्ठ रंगकर्मी-फिल्म लेखक)
ऑडिटोरियम की दशा सुधरे और वे लोकल रंगकर्मियों को आसान शर्तों और उचित रेट पर उपलब्ध हों। रवींद्र मंच का रेनोवेशन कलाकारों की कमेटी के साथ मिलकर हो और जेकेके में नियमित नाट्य प्रस्तुतियां बढ़ें। दिल्ली की एनएसडी रेपर्टरी और श्रीराम रेपर्टरी की तर्ज पर राजस्थान में भी प्रोफेशनल रेपर्टरी कंपनी बने। कलाकारों को सालभर की वित्तीय सहायता मिले।

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