गैंगरेप के बाद हत्या करने वालों की फांसी की सजा रद्द, डीएनए करने वाले की गवाही नहीं कराई

अभियोजन पक्ष को अपराध की कड़ी से कड़ी जोड़नी थी

गैंगरेप के बाद हत्या करने वालों की फांसी की सजा रद्द, डीएनए करने वाले की गवाही नहीं कराई
राजस्थान हाईकोर्ट ने गैंगरेप और हत्या के मामले में कालूराम और संजू की फांसी की सजा रद्द। अदालत ने डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञ के बयान दर्ज नहीं होने से सुनवाई को दोषपूर्ण माना।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने महिला का अपहरण कर उसके साथ गैंगरेप कर हत्या करने के मामले में दो आरोपियों को मिली फांसी की सजा को रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर आधारित है और इसमें अभियोजन पक्ष को अपराध की कड़ी से कड़ी जोड़नी थी। जिसमें डीएनए रिपोर्ट शामिल है, लेकिन इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले विशेषज्ञ को गवाह के रूप में नहीं बुलाया गया। इसके साथ अदालत ने मामला लालसोट की ट्रायल कोर्ट को वापस भेजते हुए कहा है कि डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञ को गवाह के तौर पर बुलाया जाए और बचाव पक्ष को भी सुनवाई का मौका दिया जाए।

अदालत ने निचली अदालत को कहा है कि वह मामले की सुनवाई पूरी कर तीन माह में नए सिरे से फैसला करे। जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस भुवन गोयल की खंडपीठ ने यह आदेश राज्य सरकार के डेथ रेफरेंस को खारिज कर आरोपियों की अपीलों को स्वीकार करते हुए दिए। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि ट्रायल कोर्ट के डीएनए रिपोर्ट पर निर्भर रहते हुए विशेषज्ञों के बयान नहीं लिए जाने से विचारण दूषित हो गया है।

डेथ रेफरेंस में राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता अमित कुमार पूनिया ने अदालत को बताया कि कालूराम और संजू ने 23 अप्रैल, 2022 को महिला का अपहरण कर उसके साथ कार में गैंगरेप किया था और बाद में उसकी हत्या कर शव को कुएं में फेंक दिया था। मामले में कोई प्रत्यक्ष गवाह नहीं था। ऐसे में एडीजे कोर्ट, लालसोट ने गत 19 फरवरी को दोनों अभियुक्त को दोषसिद्ध करते हुए 20 फरवरी को उन्हें फांसी की सजा सुनाई थी। राज्य सरकार की ओर से डेथ रेफरेंस पेश कर गुहार की गई की निचली अदालत के फैसले को कन्फर्म किया जाए। वहीं आरोपियों की ओर से कहा गया कि निचली अदालत ने मामले में डीएनए रिपोर्ट तैयार करने वाले विशेषज्ञ के बयान ही नहीं लिए हैं। शव का पोस्टमार्टम करने वाले डॉ. चैन सिंह ने पेश होकर माना है कि उन्हें यह रिपोर्ट तैयार होने या एफएसएल परीक्षण की प्रक्रिया के बारे में जानकारी नहीं है। बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि जब सजा डीएनए रिपोर्ट के आधार पर दी गई है तो इसे तैयार करने वाले विशेषज्ञ के बयान जरूरी थे। अदालत की ओर से मामले में नियुक्त न्यायमित्र अधिवक्ता मोहित बलवदा ने भी इसे जरूरी बताया। सभी पक्षों की बहस सुनने के बाद अदालत ने फांसी की सजा के आदेश को रद्द कर निचली अदालत को डीएनए करने वाले विशेषज्ञ के बयान दर्ज कर नए सिरे से मामले में फैसला करने को कहा है।

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