कभी सरपंचों के हाथ में थी प्रधान और जिला प्रमुख की चाबी, 1995 में बदला चुनाव का पूरा गणित
नागौर से शुरू हुआ था पंचायती राज का सफर
जयपुर। राजस्थान में पंचायत चुनाव का नाम आते ही आज गांव-गांव प्रचार, घर-घर जनसंपर्क, जातीय और सामाजिक समीकरणों की चर्चा तथा मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कवायद नजर आती है। लेकिन करीब तीन दशक पहले तक ग्रामीण राजनीति का चुनावी गणित काफी अलग था। उस समय ग्राम पंचायत के सरपंचों और दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधियों की भूमिका पंचायत समिति के गठन और प्रधान के चुनाव में बेहद अहम हुआ करती थी। प्रधान और जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने के लिए केवल जनता के बीच लोकप्रियता ही नहीं, बल्कि निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन जुटाना भी जरूरी था।
समय के साथ पंचायती राज व्यवस्था में बदलाव आया और 1995 के चुनाव इस बदलाव के महत्वपूर्ण पड़ाव बने। नई संवैधानिक व्यवस्था के तहत पंचायत समिति और जिला परिषद के सदस्यों के चुनाव में मतदाताओं की सीधी भागीदारी सुनिश्चित हुई। इसके बाद ग्रामीण राजनीति का केंद्र भी बदल गया। पहले जहां प्रतिनिधियों के समर्थन का गणित निर्णायक भूमिका निभाता था, वहीं अब प्रत्याशियों को अपने निर्वाचन क्षेत्र के मतदाताओं का विश्वास जीतना पड़ता है।
1959 में नागौर से शुरू हुआ था पंचायती राज का सफर
राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत 2 अक्टूबर 1959 को नागौर से हुई थी। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसका उद्घाटन किया था। इसका उद्देश्य गांवों में सत्ता का विकेंद्रीकरण करना और विकास से जुड़े फैसलों में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ाना था। इस व्यवस्था में ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और जिला परिषद को ग्रामीण प्रशासन की महत्वपूर्ण इकाइयों के रूप में विकसित किया गया। ग्राम पंचायत गांव के स्तर पर काम करती है, पंचायत समिति ब्लॉक स्तर पर तथा जिला परिषद जिला स्तर पर ग्रामीण विकास और योजनाओं के समन्वय में भूमिका निभाती है। हालांकि, शुरुआती दशकों में इन संस्थाओं के गठन और प्रमुखों के चुनाव की प्रक्रिया आज जैसी नहीं थी। इसी वजह से पंचायत चुनावों में सरपंचों और दूसरे निर्वाचित प्रतिनिधियों का राजनीतिक महत्व काफी अधिक था।
पहले कैसे बनते थे प्रधान और जिला प्रमुख?
पुरानी व्यवस्था में ग्राम पंचायत के पंच और सरपंच जनता के मतदान से चुने जाते थे, लेकिन पंचायत समिति और जिला परिषद के गठन में अलग प्रक्रिया अपनाई जाती थी। पंचायत समिति में ग्राम पंचायतों के सरपंच पदेन सदस्य के रूप में शामिल होते थे। प्रधान के चुनाव में पंचायत समिति के सदस्यों के साथ ग्राम पंचायतों के प्रतिनिधियों की भी भूमिका रहती थी। जिला स्तर पर भी पंचायत समितियों के प्रधानों और अन्य निर्धारित प्रतिनिधियों की भूमिका जिला परिषद की व्यवस्था से जुड़ी होती थी। इसलिए जिला प्रमुख के चुनाव में भी निर्वाचित प्रतिनिधियों का समर्थन महत्वपूर्ण माना जाता था।
इस व्यवस्था में चुनावी रणनीति का एक अलग ही रूप दिखाई देता था। प्रत्याशी और राजनीतिक दल गांवों के मतदाताओं के साथ-साथ प्रभावशाली सरपंचों तथा अन्य प्रतिनिधियों से भी संपर्क साधते थे। प्रतिनिधियों के बीच समर्थन जुटाना और स्थानीय समीकरण साधना प्रधान तथा जिला प्रमुख की कुर्सी तक पहुंचने का अहम रास्ता बन सकता था।
1965 के बाद 13 साल तक नहीं हुए आम चुनाव
राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों का इतिहास कई उतार-चढ़ाव से भरा रहा है। राज्य निर्वाचन आयोग के चुनावी इतिहास के अनुसार, प्रदेश में पहला आम चुनाव 1960 में हुआ था। इसके बाद 1965, 1978, 1981 और 1988 में आम चुनाव हुए। इन आंकड़ों में सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि 1965 के बाद अगला आम चुनाव 1978 में हुआ। यानी पंचायत राज संस्थाओं के चुनावों के बीच करीब 13 साल का अंतर रहा। यह दौर बताता है कि ग्रामीण लोकतंत्र की नियमित चुनावी व्यवस्था हमेशा एक जैसी नहीं रही। उस समय पंचायत चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग के पास नहीं थी। बाद में संवैधानिक व्यवस्था के तहत चुनावों को अधिक नियमित और संस्थागत बनाने की दिशा में कदम उठाए गए।
73वें संविधान संशोधन से आया बड़ा बदलाव
देश में पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक आधार देने के लिए संसद ने 1992 में 73वां संविधान संशोधन पारित किया। यह 24 अप्रैल 1993 से प्रभावी हुआ। इसके बाद राजस्थान में पंचायती राज अधिनियम, 1994 लागू किया गया और जुलाई 1994 में राज्य निर्वाचन आयोग का गठन हुआ। नए प्रावधानों के तहत 1995 में पंचायत राज संस्थाओं के आम चुनाव कराए गए। यह चुनाव ग्रामीण लोकतंत्र की व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण बदलाव का पड़ाव साबित हुआ। संविधान के भाग-9 में पंचायतों से जुड़े प्रावधान शामिल किए गए। अनुच्छेद 243E के तहत पंचायतों का सामान्य कार्यकाल पांच वर्ष तय किया गया, जबकि अनुच्छेद 243K के तहत पंचायत चुनावों की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग को सौंपी गई। इससे चुनावों की निगरानी और नियमित चुनाव कराने के लिए संवैधानिक व्यवस्था बनी।
73वें संविधान संशोधन के तहत अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण तथा महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई सीटों और अध्यक्ष पदों पर आरक्षण का प्रावधान किया गया। राजस्थान में लागू कानून और बाद के संशोधनों के तहत प्रतिनिधित्व की व्यवस्था आगे विकसित हुई।
अब प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव कैसे होता है?
वर्तमान व्यवस्था में मतदाता अपने क्षेत्र से पंचायत समिति सदस्य और जिला परिषद सदस्य चुनते हैं। इसके बाद पंचायत समिति के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से प्रधान और उपप्रधान चुनते हैं। इसी तरह जिला परिषद के निर्वाचित सदस्य अपने बीच से जिला प्रमुख और उपजिला प्रमुख का चुनाव करते हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रधान और जिला प्रमुख के चुनाव में आम जनता सीधे इन पदों के लिए मतदान नहीं करती, बल्कि वह उन सदस्यों को चुनती है जो बाद में अपने प्रमुख का चुनाव करते हैं। इस व्यवस्था में भी राजनीतिक दलों के लिए निर्वाचित सदस्यों का समर्थन जुटाना महत्वपूर्ण रहता है। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अब प्रधान और जिला प्रमुख का चुनाव सीधे जनता करती है। बदलाव यह हुआ है कि पंचायत समिति और जिला परिषद के निर्वाचित सदस्यों को चुनने में जनता की सीधी भूमिका स्पष्ट हुई और प्रमुखों का चुनाव उन्हीं सदस्यों के माध्यम से होता है।
चुनावी इतिहास की तारीखें एक नजर में
| वर्ष | प्रमुख घटनाक्रम |
| 1959 | 2 अक्टूबर को नागौर से राजस्थान में पंचायती राज व्यवस्था की शुरुआत |
| 1960 | पंचायती राज संस्थाओं का पहला आम चुनाव |
| 1965 | दूसरा आम चुनाव |
| 1978 | लंबे अंतराल के बाद तीसरा आम चुनाव |
| 1981 | चौथा आम चुनाव |
| 1988 | पांचवां आम चुनाव |
| 1992-93 | 73वां संविधान संशोधन पारित और प्रभावी |
| जुलाई 1994 | राजस्थान राज्य निर्वाचन आयोग का गठन |
| 1994 | राजस्थान पंचायती राज अधिनियम लागू |
| 1995 | नई संवैधानिक व्यवस्था के तहत आम चुनाव |
| 2000, 2005, 2010 | राज्य निर्वाचन आयोग के तहत अगले आम चुनाव |

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