वाल्मीकि जयंती : वाल्मीकि ही संसार के पहले कवि, जिन्होंने 2700 साल पहले लिखी थी रामायण
देश के 50 लाख घरों में यह महाकाव्य
जयपुर। गीता प्रेस ने वाल्मीकि रामायण की 11 लाख से अधिक प्रतियां अब तक बेची हैं। अन्य जगहों के प्रकाशित ब्यारों के अनुवार अब तक करीब 50 लाख घरों में रामायण होगी। अयोध्या के राममंदिर आंदोलन के बाद भी रामायण की बिक्री पर असर नहीं पड़ा। दुनिया भर में भारत और भारतीय डायस्पोरा में रामयण काफी बिकती है। विदेशों की तुलना में थाईलैंड और इंडोनेशियाई में सबसे अधिक मांग है। एक निजी पुस्तक विके्रता विनोद नाटानी बताते हैं, रामायण की बिक्री अभी भी होती है।
महर्षि वाल्मीकि के बारे में पांच रोचक तथ्य :
1. वाल्मीकि का मूल नाम विविध परंपराओं में अलग-अलगहै। कुछ कथाओं में रत्नाकर, कुछ में अग्नि शर्मा, कुछ में लोहजंघ। वह प्रचेतस के पुत्र भी बताए जाते हैं।
2. कथा है कि वे साधना में इतने लीन थे कि उनके चारों तरफ दीमकों (वल्मीक) ने घर बना लिया था। इसी से वे वाल्मीकि कहलाए।
3. प्रेमरत क्रौंच पक्षी के एक जोड़े का शिकार देखकर उनके मुंह से सहसा यह श्लोक निकला था : ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती: समा:। यत्क्रौञ्चमिथुनादेकमवधी: काममोहितम्॥’ यह संस्कृत का पहला श्लोक है। इसी से काव्य उत्पन्न् हुआ और वाल्मीकि आदि कवि माने गए।
4. वाल्मीकि ने ही वनाश्रय के समय सीता को रखा और लव-कुश को शिक्षा दी।
5. वाल्मीकि संसार के पहले कवि हैं, जिन्होंने 24000 श्लोक, 4,80,002 शब्द आज से 2700 से 2500 साल पहले लिखे और उनकी पंक्तियों में कुछ खास फर्क नहीं आया।
रामायण के बारे में पांच रोचक तथ्य :
1. रामायण के 1000वें श्लोक के पहले अक्षरों को मिलाएं तो गायत्री छंद (24 अक्षर) बन जाता है।
2. लक्ष्मण रेखा का प्रसंग मूल रामायण में नहीं है।
3. वाल्मीकि राम को आदर्श राजा के रूप में देखते हैं।
4. दुनिया भर में 300 से अधिक तरह की रामायण हैं। थाईलैंड (रामकियेन), इंडोनेशिया, मलेशिया, कंबोडिया आदि में अपनी-अपनी रामायणें हैं।
5. रामायण के श्लोकों में अनुष्टुप छंद का प्रयोग है।
उत्तररामचरित में वाल्मीकि :
भवभूति के संस्कृत नाटक उत्तररामचरित में महर्षि वाल्मीकि एक महत्त्वपूर्ण पात्र हैं। वे सीता को अपने आश्रम में आश्रय देते हैं, जहां लव-कुश का पालन-पोषण और शिक्षा होती है। उनका आश्रम कथा में करुणा, वात्सल्य और नैतिक गरिमा का केंद्र बनता है। वाल्मीकि केवल ऋषि ही नहीं, बल्कि सीता के संरक्षक और रामकथा के साक्षी के रूप में भी सामने आते हैं। उनकी उपस्थिति नाटक में बिछड़े परिवार के पुनर्मिलन की भूमिका तैयार करती है और कथा को भावनात्मक उत्कर्ष प्रदान करती है।

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