वर्ल्ड कैंसर डे : राजस्थान में कैंसर की दर देश के औसत से 20% ज्यादा, प्रति एक लाख में राष्ट्रीय औसत 113

ग्रामीण क्षेत्रों में शहरों के मुकाबले कैंसर के रोगी ज्यादा 

वर्ल्ड कैंसर डे : राजस्थान में कैंसर की दर देश के औसत से 20% ज्यादा, प्रति एक लाख में राष्ट्रीय औसत 113

प्रदेश में कैंसर के बढ़ते मामलों पर चौंकाने वाली स्टडी सामने आई है जिसमें राजस्थान में कैंसर की दर देश के औसत से लगभग 20 अधिक है। देश में प्रति एक लाख में कैंसर के मामलों के 113 है जबकि राजस्थान में यह औसत 134 तक आ गया है जोकि चिंता की बात है।

जयपुर। प्रदेश में कैंसर के बढ़ते मामलों पर चौंकाने वाली स्टडी सामने आई है जिसमें राजस्थान में कैंसर की दर देश के औसत से लगभग 20 अधिक है। देश में प्रति एक लाख में कैंसर के मामलों के 113 है जबकि राजस्थान में यह औसत 134 तक आ गया है जोकि चिंता की बात है। वर्ल्ड कैंसर डे के मौके पर दैनिक नवज्योति ने राजस्थान में बढ़ते कैंसर के मामलों पर पड़ताल की जिसमें चौंकाने वाली जानकारी सामने आई। बीएमसीएचआरसी की रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान में प्रति एक लाख आबादी पर कैंसर का दर 134.57 है, जबकि देश का औसत 113 है। ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर के मरीजों की संख्या शहरी क्षेत्रों से अधिक दर्ज की गई है। इसका कारण देर से जांच और जागरुकता की कमी माना गया है।

तंबाकू उत्पादों से मिल रहा बढ़ावा
भगवान महावीर कैंसर हॉस्पिटल के सीनियर मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. ताराचंद गुप्ता ने बताया कि राजस्थान में सिर, गला और मुंह के कैंसर के मामले सबसे अधिक हैं। कुल रोगियों में इनकी हिस्सेदारी लगभग 31.5 प्रतिशत रही। इसका मुख्य कारण तंबाकू खैनी, गुटखा और सुपारी का लगातार बढ़ता उपयोग है। दूसरे स्थान पर पाचन तंत्र से जुड़े कैंसर जो कि 14.9 प्रतिशत पाए गए, जिनमें पेट और आंत के कैंसर शामिल हैं। तीसरे स्थान पर स्तन कैंसर जो कि 12.17 प्रतिशत रहा, जो जयपुर के सांगानेर और झोटवाड़ा क्षेत्रों में सबसे अधिक देखा गया। चिंताजनक यह है कि अब 30 से 40 वर्ष की उम्र की महिलाओं में भी स्तन कैंसर के मामले तेजी से सामने आ रहे हैं। 

85 प्रतिशत मरीज देरी से पहुंच रहे अस्पताल
सीनियर पल्मोनोलॉजिस्ट डॉ. शीतू सिंह ने बताया कि इंडियन जर्नल ऑफ  मेडिकल रिसर्च के मुताबिक भारत में लंग कैंसर के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है। वर्ष 2015 में जहां कुल 63 हजार 708 मामले सामने आए थे वहीं 2025 तक इसके 81 हजार 219 तक पहुंच गया है। विशेषज्ञों के अनुसार यह वृद्धि मुख्य रूप से धूम्रपान और वायु प्रदूषण के कारण हो रही है। करीब 85 फीसदी मरीज तब सामने आते हैं जब बीमारी एडवांस स्टेज में पहुंच चुकी होती है और इलाज की संभावना बेहद कम रह जाती है। इसके चलते हर साल लगभग 60 हजार लोगों की जान जाती है।

कैंसर मरीजों को राहत, टारगेटेड थेरेपी में 30 और इम्यूनोथेरेपी में 50 हजार तक की बचत
17 प्रकार की दवाइयों पर बजट में आयात शुल्क पूरी तरह हटा

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इस बार के बजट में कैंसर मरीजों के लिए उम्मीद जागी है। टारगेटेडथेरेपी और इम्यूनोथेरेपी जैसे महंगे इलाज में काम आने वाली दवाओं में आयात शुल्क पूरी तरह से हटा दिया गया है जिससे मरीजों की जेब को राहत मिली है। वर्ल्ड कैंसर डे के अवसर पर दैनिक नवज्योति ने शहर के कुछ कैंसर विशेषज्ञों से बात कर इस बारे में जाना। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजस्थान समेत पूरे देश में हजारों मरीजों के इलाज का खर्च कुछ हद तक कम हो सकता है। राजस्थान में हर साल लगभग 60 हजार से 70 हजार नए कैंसर मरीज सामने आते हैं, जिनमें स्तन, मुंह, फेफड़े और रक्त कैंसर के मामले अधिक हैं। इलाज की शुरुआत में पीईटी-सीटी, बायोप्सी और आईएचसी जैसी जांचों पर ही 50 हजार से एक लाख 20 हजार रुपए तक खर्च हो जाते थे। इसके बाद टारगेटेड थैरेपी और इम्यूनोथैरेपी जैसी आयातित दवाओं का मासिक खर्च दो से पांच लाख रुपए तक पहुंच जाता था क्योंकि इन पर 10 से 12 प्रतिशत बेसिक कस्टम्स ड्यूटी के साथ जीएसटी और डिस्ट्रीब्यूटर मार्जिन जुड़ता था।

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अब क्या होगा फायदा
बजट के बाद चयनित 17 कैंसर दवाओं पर आयात शुल्क खत्म कर दिया गया है। इनमें राइबोसाइक्लिब, अबेमासाइक्लिब, वेनेटोक्लैक्स, सेरिटिनिब और इपिलिमुमैब जैसी महंगी दवाएं शामिल हैं। अनुमान है कि टारगेटेड थैरेपी की मासिक लागत जो पहले लगभग 2 लाख 50 हजार रुपए थी, वह अब दो लाख से 2 लाख 20 हजार रुपए तक आ सकती है। इसी तरह इम्यूनोथैरेपी का खर्च चार लाख से घटकर करीब तीन लाख रुपए हो सकता है। यानी मरीज को हर महीने 30 हजार से 70 हजार रुपए तक की बचत हो सकती है।

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क्या कहते हैं डॉक्टर्स
ड् यूटी हटने से कैंसर मरीजों को राहत मिली है। इससे खासकर उन मरीजों को फायदा होगा जिन्हें लंबी अवधि तक टारगेटेड या इम्यूनो दवाएं लेनी पड़ती हैं। असली राहत तभी मिलेगी जब कंपनियां दाम घटाकर उत्पाद बाजार में उतारें, वरना असर सीमित रहेगा। 
-डॉ. ताराचंद गुप्ता, सीनियर मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट।

जी  वन रक्षक कैंसर दवाओं पर बेसिक कस्टम ड्यूटी समाप्त किए जाने से हर कैंसर मरीज को पचास हजार रुपए तक की सीधी बचत होगी। इलाज में खर्च कम होने मरीज पैसे की कमी के कारण बीच में इलाज नहीं छोड़ेंगे। 
-डॉ. दिवेश गोयल, सीनियर ऑन्कोलॉजिस्ट।  

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