चंबल नदी में आया प्रदूषण का उफान, अपशिष्ट पदार्थों व प्रतिमा विसर्जन से पानी हुआ प्रदूषित
जलीय गंदगी बढ़ी और आॅक्सीजन की मात्रा घटी
कोटा। जिस चंबल नदी का पानी कोटा के लाखों लोगों की प्यास बुझाता है, उसी नदी की सेहत को लेकर चिंता बढ़ रही है। नदी में अपशिष्ट पदार्थों और प्रतिमा विसर्जन से पहले और बाद के तुलनात्मक आंकड़ों में पानी की गुणवत्ता में बदलाव सामने आया है। केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के आंकड़ों के अनुसार चंबल नदी में प्रतिमा और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के विसर्जन के बाद जलीय प्रदूषण की मात्रा में बढ़ोतरी हुई है। सितंबर माह में बायो आॅक्सीजन डिमांड यानी जैविक गंदगी (बीओडी) की मात्रा 2.2-3.1 मिलीग्राम/लीटर के बीच थी। प्रतिमा विर्सजन और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के कारण अक्टूबर माह में जलीय प्रदूषण का स्तर बढ़कर 5.7-6.8 मिलीग्राम/लीटर पहुंच गया है। इसका सामान्य मानक 3.0 मिलीग्राम/लीटर है। वहीं जैविक प्रदूषण के कारण पानी में घुली आॅक्सीजन में 35 से 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है।
इस कारण तेजी से बढ़ा जलीय प्रदूषण
प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अधिकारियों के अनुसार पानी की जांच में बीओडी एक महत्वपूर्ण मानक है। आसान भाषा में समझें तो नदी में जब फूल-मालाएं, जैविक कचरा और अन्य सड़ने-गलने वाले पदार्थ पहुंचते हैं, तो उन्हें विघटित करने में सूक्ष्मजीव पानी में मौजूद आॅक्सीजन का इस्तेमाल करते हैं। ऐसी स्थिति में बीओडी बढ़ सकता है और पानी में घुली आॅक्सीजन कम हो सकती है। आॅक्सीजन की कमी ज्यादा होने पर मछलियों और दूसरे जलीय जीवों के लिए परेशानी पैदा हो सकती है। उपलब्ध आंकड़ों में विसर्जन के बाद बीओडी 5.7 से 6.8 मिलीग्राम प्रति लीटर बताया गया है, जबकि विसर्जन से पहले यह 2.2 से 3.1 मिलीग्राम प्रति लीटर था। यानी पानी में जैविक प्रदूषण काफी तेजी से बढ़ा है।
...फिर पानी में घटी आॅक्सीजन
पर्यावरण वैज्ञानिकों के अनुसार जिस तरह इंसानों को सांस लेने के लिए आॅक्सीजन चाहिए, उसी तरह मछलियों और कई दूसरे जलीय जीवों को पानी में घुली आॅक्सीजन की जरूरत होती है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सितंबर माह में विसर्जन से पहले पानी में आॅक्सीजन 7.2 से 7.8 मिलीग्राम प्रति लीटर थी। विसर्जन के बाद अक्टूबर माह में यह घटकर 4.1 से 4.9 मिलीग्राम प्रति लीटर रह गई। इसका मतलब है कि पानी में उपलब्ध आॅक्सीजन कम हुई। यदि आॅक्सीजन लंबे समय तक कम रहती है, तो जलीय जीवों पर बुरा असर पड़ सकता है। चंबल नदी में मछलियों सहित विभिन्न प्रकार के जलीय जीवों ने आशियाना बना रखा है। ऐसे में आॅक्सीजन की कमी से उनकी जीवनशैली पर प्रभाव होने की संभावना बनी जाती है।
फैक्ट फाइल
-पानी की जांच विसर्जन से पहले विसर्जन के बाद
-जैविक गंदगी (बीओडी) 2.2-3.1 5. 7-6.8 मिलीग्राम/लीटर
-घुलित आॅक्सीजन (डीओ) 7.2-7.8 4.1-4.9 मिलीग्राम/लीटर
-पानी का गंदलापन (एनटीयू) 18-24 55-82
-पानी की प्रकृति(पीएच) 7.8-8.2 8.9-10.15
-कुल कोलीफॉर्म जीवाणु 800-1200 4000-6500
-आंकडे केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण मंडल के अनुसार
क्या करना जरूरी है?
-प्रतिमाओं के लिए पर्यावरण अनुकूल सामग्री के इस्तेमाल को बढ़ावा दिया जाए।
-फूल-मालाओं और सजावटी कचरे को नदी में जाने से रोका जाए।
-शहर के नालों के पानी की नियमित जांच हो।
-सीवेज शोधन संयंत्रों की क्षमता और वास्तविक कामकाज की समीक्षा की जाए।
-नदी के पानी की गुणवत्ता में बदलाव के लिए जिम्मेदार स्रोतों की पहचान की जाए।
एक्सपर्ट व्यू
चंबल को बचाना सबकी जिम्मेदारी
चंबल नदी केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि मछलियों, अन्य जलीय जीवों और पूरे नदी तंत्र का आधार भी है। इसलिए नदी में प्रदूषण बढ़ने का असर केवल पानी तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि जलीय जीवों सहित विभिन्न कारकों पर होता है। ऐसे में चंबल को प्रदूषित मुक्त करने की सभी की जिम्मेदारी है। इसके लिए जनभागीदारी के साथ प्रशासनिक सहयोग काफी जरूरी है।
-डॉ. सुधीर गुप्ता, पर्यावरणविद्
नदियों के जलस्तर को टोटल कोलीफार्म, पीएच, डीओ और बीओडी के मानक के आधार पर जांचा जाता है। प्रतिमा विसर्जन और अन्य अपशिष्ट पदार्थों के पानी में घुलनशील होने के बाद यह चारों मानक फैल हो जाते हैं। इससे जलीय प्रदूषण की मात्रा बढ़ जाती है।
-ए. के. जेटली, एसएसओ, राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल

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