बच्चों के भविष्य में रोशनी भर रही ऊषा, 7 बच्चों से शुरू हुई ‘तारे जमीन पर’ में अब 65 नौनिहाल
कंप्यूटर कोर्स से लेकर धार्मिक स्थलों की सैर तक, हर गतिविधि में बच्चों के सर्वांगीण विकास पर जोर
कोटा। कभी घर में बच्चों की चहकती आवाजें गूंजती थीं, लेकिन जब दोनों बच्चे पढ़ाई के लिए बाहर चले गए तो ऊषा बाफना को घर में अकेलापन महसूस होने लगा। शुरुआत में उन्होंने समय बिताने की कोशिश की, लेकिन जल्द ही मन में विचार आया कि इस खाली समय का उपयोग किसी ऐसे काम में किया जाए, जिससे दूसरों की जिंदगी में भी खुशियां आ सकें। इसी सोच ने एक छोटी-सी पहल को जन्म दिया। वर्ष 2016 में घर के पीछे स्थित चौक में महज 7-8 बच्चों के साथ शुरू हुई शाम की पाठशाला आज 60 से 65 बच्चों के भविष्य को संवार रही है। ‘तारे जमीन पर’ नाम की इस पाठशाला में पांच शिक्षिकाएं बच्चों को शिक्षा देने के साथ संस्कार और आत्मविश्वास का पाठ भी पढ़ा रही हैं।
कामवाली बाई से बातचीत बनी बदलाव की वजह
ऊषा बाफना बताती हैं कि घर पर काम करने आने वाली महिला से बातचीत के दौरान उन्हें बच्चों को पढ़ाने का विचार आया। इसके बाद उन्होंने घर के पीछे चौक में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया। शुरुआत में न कोई बड़ा भवन था, न विशेष संसाधन। बस बच्चों को पढ़ाने और उन्हें सही दिशा देने का संकल्प था। शुरुआती दिनों में बच्चों को पढ़ाई के प्रति प्रेरित करना और उनमें अनुशासन विकसित करना आसान नहीं था। कई बच्चों को पढ़ाई में अतिरिक्त मदद की जरूरत थी। ऊषा ने धैर्य के साथ हर बच्चे को समझना शुरू किया। उनका मानना था कि जिस तरह माता-पिता अपने बच्चों को शिक्षा और संस्कार देते हैं, उसी तरह दूसरे बच्चों को भी सही मार्गदर्शन देकर उनका भविष्य बेहतर बनाया जा सकता है।
पढ़ाई के साथ संस्कार और व्यक्तित्व विकास पर जोर
ऊषा के लिए पाठशाला का उद्देश्य केवल बच्चों को किताबें पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें जिम्मेदार और आत्मविश्वासी इंसान बनाना भी है। वह चाहती हैं कि बच्चे पढ़ाई में आगे बढ़ने के साथ अच्छे व्यवहार, अनुशासन और जीवन के मूल्यों को भी समझें।शुरुआत के करीब दो साल बाद, जब वह इनरव्हील में सचिव बनीं, तब इस काम को आगे बढ़ाने का अवसर मिला। इसी दौरान उन्होंने पहली शिक्षिका को नियुक्त किया। खास बात यह रही कि उस महिला को भी पारिवारिक परिस्थितियों के चलते काम की जरूरत थी। इस तरह पाठशाला बच्चों की शिक्षा के साथ एक महिला के लिए रोजगार का माध्यम भी बनी। धीरे-धीरे बच्चों की संख्या बढ़ी और अन्य शिक्षिकाएं भी जुड़ती गईं।
बच्चों ने ही दिया ‘तारे जमीन पर’ नाम
पाठशाला का नाम भी बच्चों ने ही ‘तारे जमीन पर’ रखा। यह नाम उस सोच को दर्शाता है कि हर बच्चे के भीतर कोई न कोई प्रतिभा छिपी होती है। जरूरत है तो बस उसे पहचानने, निखारने और आगे बढ़ने का अवसर देने की। आज यहां शाम 4 से रात 8 बजे तक कक्षाएं संचालित होती हैं। पांच शिक्षिकाएं करीब 60 से 65 बच्चों को पढ़ाती हैं। बच्चों को आधुनिक तकनीक से जोड़ने के लिए कंप्यूटर कोर्स भी चलाया जा रहा है, ताकि भविष्य में उनके सामने रोजगार और शिक्षा के नए अवसर खुल सकें।
पढ़ाई के साथ घूमना और सीखना भी
बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पाठशाला में पढ़ाई के अलावा मनोरंजक और सामाजिक गतिविधियां भी आयोजित की जाती हैं। साल में एक बार बच्चों को बस से किसी धार्मिक स्थल पर ले जाया जाता है। इससे उन्हें नई जगहें देखने, साथियों के साथ समय बिताने और सामूहिक जीवन के अनुभव सीखने का अवसर मिलता है।ऊषा बताती हैं कि बच्चों की प्रगति और उनके व्यवहार में सकारात्मक बदलाव देखना उन्हें सबसे ज्यादा सुकून देता है। इस सफर में परिवार का सहयोग भी लगातार मिला है। घर के सदस्य उनके इस प्रयास में पूरा साथ देते हैं।एक खालीपन से शुरू हुआ यह सफर आज दर्जनों बच्चों के सपनों को नई दिशा दे रहा है। ऊषा बाफना की यह पहल बताती है कि समाज में बदलाव लाने के लिए हमेशा बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती। कई बार एक छोटी-सी शुरुआत और दूसरों के लिए कुछ करने का भाव ही भविष्य की नई रोशनी बन जाता है।

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